Tata Play IPO: टाटा ग्रुप (Tata Group) की दिग्गज कंपनी Tata Play (पूर्व Tata Sky) आईपीओ लाने की तैयारी कर रही है। इस आईपीओ की खास बात यह है कि यह अपनी तरह का पहला आईपीओ होगा। आमतौर पर जब कंपनियां आईपीओ लाती हैं, तो वे बाजार नियामक सेबी (SEBI) के पास एक ड्राफ्ट फाइल करती हैं जिसमें कंपनी और आईपीओ से जुड़ी ढेर सारी डिटेल्स होती हैं लेकिन टाटा प्ले ने कान्फिडेन्शल कागजात दाखिल किए हैं यानी कि कोई भी जानकारी पब्लिक डोमेन में नहीं है। अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा में रेलुगेटरी अथॉरिटी के पास रिव्यू के लिए ऐसे ऑफर डॉक्यूमेंट फाइल करने का चलन है लेकिन अपने यहां इस तरह का यह पहला मामला है।
सेबी ने खुद पिछले साल ही नवंबर में इस रास्ते को खोला था और इस रास्ते का इस्तेमाल करने वाली टाटा प्ले पहली कंपनी बन गई। इसने पिछले साल नवंबर 2022 में आईपीओ के लिए कान्फिडेन्शल ड्राफ्ट फाइल कर दिया है। इसे सेबी से 26 अप्रैल को ऑब्जर्वेशन लेटर मिल चुका है जो एक तरह से आईपीओ लाने की मंजूरी है।
ये पब्लिक और कान्फिडेन्शल फाइलिंग का क्या है मसला
आमतौर पर कंपनियां आईपीओ के लिए सेबी के पास ड्राफ्ट फाइल करती हैं, उसमें कंपनी से जुड़ी अहम डिटेल्स के साथ-साथ आईपीओ के साइज और अन्य जरूरी डिटेल्स होती हैं। ये सभी जानकारियां पब्लिक डोमेन में आ जाती हैं। वहीं दूसरी तरफ कान्फिडेन्शल फाइलिंग में ऐसा कुछ पब्लिक डोमेन में नहीं होता है। इससे कंपनियों को अपडेटेड ड्राफ्ट फाइल करने तक इश्यू साइज, नए शेयरों और ऑफर फॉर सेल के तहत शेयरों की संख्या में बदलाव को लेकर सहूलियत होती है। यह अपडेटेड ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस पब्लिक डोमेन में होता है।
कान्फिडेन्शल रास्ते की जरूरत क्यों पड़ी?
नॉर्मल रूट के जरिए कंपनी को आईपीओ के ड्राफ्ट में अपने कारोबार से जुड़ी संवेदनशील जानकारियां मुहैया करनी होती हैं। हालांकि हर समय इसकी आशंका बनी रहती है कि प्रतिस्पर्धी कंपनियां इसका फायदा उठा सकती है। इसके अलावा अगर बाजार की विपरीत परिस्थितियों के चलते कंपनी आईपीओ लाने की प्लान आगे खिसका देती है या रद्द कर देती है तो यह जब लंबे गैप के बाद फिर से बाजार में पहुंचता तो काफी कुछ बदल जाता है। इन सब वजहों से सेबी ने प्री-फाइलिंग मैकेनिज्म यानी कान्फिडेन्शल तरीका लॉन्च किया है। इसमें कंपनियों को अपनी संवेदनशील जानकारियों का तब खुलासा करना होता है जब इसे सेबी के लिए मंजूरी मिल जाती है। हालांकि कान्फिडेन्शल फाइलिंग में एक घाटा ये होता है कि इसमें सीमित मार्केटिंग को ही मंजूरी मिलती है।
दोनों के फाइलिंग के तरीकों में क्या है अंतर
आईपीओ के आवेदन के आम तरीके में कंपनियां पहले जरूरी जानकारियों के साथ सेबी और स्टॉक एक्सचेंजों के पास ड्राफ्ट फाइल करती है। इस पर मंजूरी मिलने के बाद कंपनियां एक साल के भीतर आईपीओ ला सकती हैं। इश्यू खुलने के कम से कम दो दिन पहले रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (RHP) फाइल करती है जिसमें प्राइस बैंड और बाकी डिटेल्स होती हैं। वहीं कान्फिडेन्शल में बात करें तो कंपनियां प्री-फाइलिंग रूट के जरिए ऐसा ड्राफ्ट फाइल करती हैं जिसकी डिटेल्स पब्लिक डोमेन में नहीं आती है। सेबी से मंजूरी मिलने के 18 महीने के भीतर यह इश्यू खुल सकता है लेकिन सेबी के पास अपडेटेड ड्राफ्ट जो पब्लिक डोमेन में आता है, उसे फाइल करना होता है।