Lok Sabha Elections 2024: वाराणसी में इस बार भी PM मोदी पर रहेगा मां गंगा का आशीर्वाद, विपक्ष की रणनीति कर पाएगी कुछ कमाल?
Lok Sabha Elections 2024: नरेंद्र मोदी का चुनाव क्षेत्र होने के कारण ही सभी विपक्षी दलों की यह चाहत ज्यादा प्रबल है कि किसी तरह मोदी के किले को ढहा दें। इसके लिए बनारस में चुनावी चक्रव्यूह सजाया जा रहा है। मोदी तो मैदान में हैं ही, लेकिन विपक्षियों की रणनीति कितनी सफल होगी यह समय बताएगा
नरेंद्र मोदी ने अपने लिए विश्वनाथ धाम वाराणसी को चुना और अपने निर्णय के संबंध में उन्होंने बताया भी उन्हें 'मां गंगा ने बुलाया है'
Lok Sabha Elections 2024: बाबा विश्वनाथ की नगरी बनारस (Varanasi)। अपनी मस्ती और फक्कड़ पन के लिए यह दुनिया में जानी जाती है। लोगों का विश्वास है कि काशी भगवान शिव के त्रिशूल पर बसी हुई है और इस धरती के मिट्टी की ही महिमा है, जिसके कारण यहां पर कबीर से लेकर रामानंदाचार्य, तुलसी दास और संत रविदास ने भक्ति की नई धारा बहाई। बिस्मिल्लाह खान की शहनाई यहीं गंगा तट पर गूंजी और यहीं पर उन्हें साक्षात भगवान शिव की कृपा का एहसास भी हुआ। भंग की तरंग की मस्ती भी है और बनारसी पान का मजा भी।
कांग्रेस की वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री पंडित कमलापति त्रिपाठी जब लखनऊ में रहती थी, तो उनके लिए पान बनारस से ही जाता था। लेकिन अब इसकी एक और पहचान हो चुकी है कि बनारस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है। नरेंद्र मोदी का चुनाव क्षेत्र होने के कारण ही सभी विपक्षी दलों की यह चाहत ज्यादा प्रबल है कि किसी तरह मोदी के किले को ढहा दें । इसके लिए बनारस में चुनावी चक्रव्यूह सजाया जा रहा है।
विपक्ष की क्या है इच्छा?
विपक्षी यह साबित करने में लगे हैं कि मोदी के लिए यह लड़ाई आसान नहीं है, क्योंकि सपा और कांग्रेस एक हो चुके हैं। यह अलग बात है कि 2019 के लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Elections 2024) में सपा बसपा एकजुट थे, लेकिन मोदी कहीं ज्यादा अंतर से जीत गए।
BJP यह बताने में लगी हुई है कि मोदी के खिलाफ इस बार विपक्ष की जमानत जब्त हो जाएगी। इस चुनावी जंग में जो भी विपक्षी चेहरा आया तमाम उम्मीदें लेकर आया कि अगर मोदी को कड़ी टक्कर ही दे दे तो इतिहास बन जाएगा। लेकिन आंकड़े यही बताते हैं कि मोदी के जीतने का इतिहास बनता जा रहा है।
जब 2014 में पहली बार नरेंद्र मोदी बनारस से चुनाव लड़ने आए, तो दिल्ली से आकर अरविंद केजरीवाल ने यह कह कर यहां झंडा गाड़ा था कि वह चुनावी दौड़ में बहुत आगे चल रहे हैं और नरेंद्र मोदी को हराकर जाएंगे। मगर केजरीवाल को बुरी तरह पराजित होकर के लौट जाना पड़ा।
यही नहीं पिछले चुनाव में भी तमाम बड़े-बड़े दावे किए जा रहे थे, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लगभग 63 प्रतिशत वोट मिला और यह अपने आप में एक रिकॉर्ड है।
मोदी को टक्कर देने उतरी कांग्रेस
नरेंद्र मोदी को टक्कर देने की कमान इस बार कांग्रेस ने अपने हाथ में ली है। कांग्रेस नेताओं ने यह सीट समाजवादी पार्टी से मांगी थी, क्योंकि उन्हें लगता है कि उनकी पार्टी के अध्यक्ष अजय राय या 2004 में लोकसभा चुनाव जीते राजेश मिश्रा बहुत लोकप्रिय हैं और इस बार नरेंद्र मोदी को मुश्किल चुनौती देंगे। कोशिश यह हो रही है कि इस चुनाव को द्विकोणीय बना दिया जाए और फिर लड़ाई का परिणाम देखा जाए।
कांग्रेस इतनी उत्साहित है कि उसे लगता है कि अगर प्रियंका गांधी वाराणसी के मैदान में उतर जाएं, तब चुनाव बहुत ही रोचक हो जाएगा, लेकिन कांग्रेस के एक नेता कहते हैं कि उन्हें नहीं लगता कि प्रियंका गांधी मैदान में आएंगी। वह पहला चुनाव लड़ें और उसमें भी धोखा हो जाए, यह कोई नहीं चाहेगा।
फिलहाल विपक्ष की ओर से बनारस में पूरी ताकत लगाने की तैयारी हो रही है, जिससे नरेंद्र मोदी को संकट में डाला जा सके। हालांकि, आंकड़े इसमें उनका साथ नहीं देते दिख रहे। 2014 से अब तक मोदी की स्थिति दिन पर दिन मजबूत हुई है। बनारस बदल चुका है। वहां जो विकास कार्य हुए हैं, वो मोदी के विरोधियों को परेशानी में डाल देते हैं।
जब विपक्षा गाता था- मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है
साल 2014 में, जब भारतीय जनता पार्टी ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित किया, तो बीजेपी में इस बात पर विचार होने लगा कि मोदी को उत्तर प्रदेश या बिहार में किसी सीट से चुनाव मैदान में उतारा जाए। वास्तव में इस फैसले का बहुत असर होने वाला था। आखिरकार नरेंद्र मोदी ने अपने लिए विश्वनाथ धाम वाराणसी को चुना और अपने निर्णय के संबंध में उन्होंने बताया भी उन्हें 'मां गंगा ने बुलाया है' और इसी जगह से चुनावी लड़ाई का बिगुल बज गया।
उधर विपक्षी दल इस बात को समझ नहीं पा रहे थे कि नरेंद्र मोदी कुछ असर भी दिखा पाएंगे या नहीं। ज्यादातर की यही धारणा थी कि गुजरात के एक नेता की उत्तर प्रदेश में क्या जगह है और इसको वह डंके की चोट पर कहते थे कि उत्तर प्रदेश में आपकी क्या भूमिका है। 'मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है' जैसे गाने गाते थे। आप वापस गुजरात चले, जाएं क्योंकि उत्तर प्रदेश आपको स्वीकार नहीं करेगा।
विपक्ष की इस राजनीति के कुछ कारण भी थे। उत्तर प्रदेश की राजनीति के जातीय टुकड़ों में बंटी हुई थी और विपक्षी दलों को लगता था कि जातिय समीकरण मोदी के पक्ष में नहीं है और उनको निराश होकर उत्तर प्रदेश से जाना पड़ेगा। अरविंद केजरीवाल राजनीति में नए-नए थे और उन्हें लगता था कि पूरा भारत आशा भरी निगाहों से उनकी ओर देख रहा है।
AAP ने बनाई हवा, खुद की निकल गई हवा
AAP ने घोषित कर दिया की एक नया इतिहास बनने वाला है, क्योंकि अरविंद केजरीवाल बनारस जा रहे हैं और यहीं से नरेंद्र मोदी की पराजय का सिलसिला शुरू हो जाएगा। वास्तव में विपक्षी नेता जमीनी आकलन नहीं कर पा रहे थे। लेकिन ज्यों ही मोदी की रैलियां शुरू हुईं विपक्षी नेताओं को ही एहसास हो गया कि जितना कमजोर वह समझ रहे थे, मोदी उससे कहीं ज्यादा मजबूत हैं।
अरविंद केजरीवाल ने बनारस में डेरा डाल दिया। पूरे देश के तमाम मोदी विरोधी बनारस पहुंचने लगे और यह घोषणा हो गई कि अरविंद केजरीवाल बहुत आगे चल रहे हैं। उस चुनाव में कई दिन रुक कर मैंने भी अरविंद केजरीवाल के आक्रामक प्रचार को देखा था। लेकिन मतदान हुआ और अरविंद केजरीवाल लगभग 3 लाख से ज्यादा वोटों से हार गए।
2019 में नरेंद्र मोदी की जीत का अंतर और बढ़ गया। वास्तव में बनारस ऐसी सीट है, जो बीजेपी के लिए काफी मदद करने वाली साबित हुई। 2004 में कांग्रेस के टिकट पर राजेश मिश्रा चुनाव जीत गए, लेकिन इसके पीछे बीजेपी के उम्मीदवार शंकर प्रसाद जायसवाल के प्रति नाराजगी का कारण बताया जाता है।
बनारस में हुए कई प्रयोग
बनारस पर कई प्रयोग भी किए गए। एक प्रयोग मायावती ने भी किया जब 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने बीजेपी के दिग्गज नेता मुरली मनोहर जोशी के खिलाफ कुख्यात डान मुख्तार अंसारी को मैदान में उतार दिया और उसका प्रचार करने खुद भी पहुंच गईं। यही नहीं मायावती ने मुख्तार अंसारी को 'रॉबिनहुड' करार दिया।
यही उत्तर प्रदेश की राजनीति की असलियत रही है। यहां पर जीतने के लिए हर दांव चले जाते हैं। परिणाम यह हुआ कि डॉ. जोशी बमुश्किल 17 हजार वोटों से जीत सके। इसी सीट से राम जन्मभूमि आंदोलन की प्रमुख नेता और उत्तर प्रदेश के पूर्व DGP श्री चंद दीक्षित भी चुनाव लड़े और जीते। अब एक बार फिर मैदान सज रहा है। मोदी तो मैदान में हैं ही, लेकिन विपक्षियों की रणनीति कितनी सफल होगी यह समय बताएगा।