Electoral Bond: सुप्रीम कोर्ट (SC) ने हाल ही में इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम (Electoral Bond Scheme) को रद्द कर दिया था। अब ऐसी अटलकें लगाई जा रही हैं कि केंद्र सरकार जल्द ही राजनीतिक चंदे को लेकर एक नई स्कीम ला सकती है। रिपोर्ट्स की मानें, तो कथित तौर पर सरकार राजनीतिक दलों की फंडिंग के लिए एक नई योजना पर काम कर रही है। सरकार चुनावी बॉन्ड योजना की जगह इस नई स्कीम को लेकर आ सकती है।
Mint की एक रिपोर्ट में सरकार में इस मामले से जुड़े दो सूत्रों का हवाला देते हुए कहा गया है कि नई योजना में "उन प्वाइंट्स या सवालों पर ज्यादा ध्यान दिया जाएगा" जिन पर शीर्ष अदालत ने इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम को रद्द करते समय सवाल उठाए थे।
लोकसभा चुनाव के बाद आ सकती है ये स्कीम
रिपोर्ट में अज्ञात सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि नई योजना 2024 लोकसभा चुनावों (Loksabha Elections 2024) के बाद पेश होने की उम्मीद है। लोकसभा की 543 सीटों के लिए 19 अप्रैल से 1 जून तक सात चरणों में मतदान होगा। वोटों की गिनती और नतीजों की घोषणा 4 जून को होनी है।
रिपोर्ट के अनुसार, वित्त मंत्रालय नई योजना पर अंदरूनी तौर विचार विमर्श कर रहा है। इसके आने से पर राजनीतिक दलों के लिए फंडिंग के नए रास्ते खुल सकते हैं। सूप्रीम कोर्ट की तरफ से इलेक्टोरल बॉन्ड पर रोक लगाए जाने के बाद राजनीतिक फंडिंग का एक बड़ा रास्ता बंद हो गया था।
इलेक्टोरल बॉन्ड का विरोध करने वालों को होगा पछतावा
इस बीच, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनावी बॉन्ड योजना को खत्म करने पर अपनी पहली प्रतिक्रिया में कहा, “नाचने और गर्व करने वालों” को जल्द ही इसका पछतावा होगा।
एक तमिल चैनल - Thanthi TV के साथ हाल ही में एक इंटरव्यू में, पीएम मोदी ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि शीर्ष अदालत की ओर से इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम को असंवैधानिक करार देना उनकी सरकार के लिए एक झटका था।
पीएम ने कहा कि कोई भी सिस्टम परफेक्ट नहीं होता और किसी भी कमी को सुधारा जा सकता है। उन्होंने कहा, “मुझे बताइए, हमने ऐसा क्या किया है कि मैं इसे एक झटका मानूं? मेरा दृढ़ विश्वास है कि जो लोग इस पर जश्न मना रहे हैं और इस पर गर्व कर रहे हैं, वे पश्चाताप करेंगे।”
इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम 2017 में शुरू की गई थी। इसके जरिए व्यक्तियों और कॉर्पोरेट संस्थाओं को वित्तीय साधनों के जरिए गुमनाम रूप से राजनीतिक दलों को पैसा दिया जा सकता था।
इस साल 15 फरवरी को एक एतिहासिक फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बॉन्ड (Electoral Bond) योजना को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि 2017 के वित्त अधिनियम के जरिए ला गए इस कानून में कुछ प्रावधान राजनीतिक फंडिंग से जुड़ी जानकारी का खुलासा न करने के कारण "असंवैधानिक" थे।
राजनीतिक फंडिंग की जटिलता को समझाते हुए हुए, सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड पॉलिटिक्स के डायरेक्टर एके वर्मा ने कहा, “एक राजनीतिक फंडिंग व्यवस्था विकसित करने की संभावना है, जो पार्टियों और दानदाताओं को शर्मिंदगी पैदा किए बिना पारदर्शी भी हो। इससे इनकार नहीं किया जा सकता, बशर्ते उस दिशा में प्रयास किया जाए।”
वर्मा ने कहा, “यह चुनाव के बाद ही हो सकता है। शीर्ष अदालत को वैकल्पिक रास्ता निकालने देना चाहिए था।"