Banking Stocks: बैकिंग सेक्टर के शेयरों पर आज 2 अप्रैल को भारी दबाव देखने को मिली। कई बड़े बैंकों के शेयर कारोबार के दौरान 4 प्रतिशत तक टूट गए। निफ्टी बैंक इंडेक्स भी शुरुआती कारोबार में करीब 2.6% तक लुढ़क गया। वहीं निफ्टी पीएसयू बैंक और निफ्टी प्राइवेट बैंक इंडेक्स में क्रमश: 3.2% और 2.1% की गिरावट देखने को मिली। यह गिरावट ऐसे समय में आई है जब भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने रुपये में सट्टेबाजी को रोकने के लिए सख्त कदम उठाए हैं।
किन शेयरों में सबसे ज्यादा गिरावट?
कारोबार के दौरान कई बैंकिंग शेयरों में तेज बिकवाली देखने को मिली। AU स्मॉल फाइनेंस बैंक का शेयर करीब 4% तक गिर गया। वहीं बैंक ऑफ बड़ौदा और फेडरल बैंक के शेयरों में भी लगभग 3.8% से 3.9% की गिरावट रही। इसके अलावा यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, इंडसइंड बैंक, केनरा बैंक और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के शेयर भी 3.5% से 3.8% तक नीचे कारोबार करते दिखे। यह गिरावट निजी और सरकारी दोनों तरह के बैंकों में देखी गई।
RBI ने रुपये में हो रही सट्टेबाजी और आर्बिट्राज गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिए कई बड़े कदम उठाए हैं। केंद्रीय बैंक ने बैंकों को निर्देश दिया है कि वे कॉरपोरेट्स को फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट बेचने में ढील न दें और ऐसे कॉन्ट्रैक्ट्स को ओपन मार्केट में क्लोज करें। इसके अलावा, बैंकों को यह भी कहा गया है कि वे रद्द किए गए फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स को दोबारा बुक करने की अनुमति न दें।
RBI ने यह भी साफ किया है कि बैंक अपने संबंधित पक्षों के साथ किसी भी तरह के फॉरेक्स डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट में शामिल नहीं होंगे। इन कदमों का मकसद रुपये पर पड़ रहे दबाव को कम करना और करेंसी मार्केट में स्थिरता लाना है। नए नियम तुरंत लागू हो गए हैं।
बैंकों पर क्यों पड़ा असर?
एक्सपर्ट्स का मानना है कि RBI के ये सख्त नियम बैंकों के लिए नेगेटिव साबित हो सकते हैं। जेफरीज के एनालिस्ट प्रखर शर्मा और विनायक अग्रवाल का कहना है कि इन नियमों के चलते बैंकों को अपने मौजूदा आर्बिट्राज ट्रेड्स को बंद करना पड़ेगा, जिससे उन्हें नुकसान उठाना पड़ सकता है।
बताया जा रहा है कि बैंकों को करीब 30 अरब डॉलर के आर्बिट्राज ट्रेड्स को खत्म करना पड़ा है, जिसमें से अब तक 4 से 10 अरब डॉलर के सौदे पहले ही अनवाइंड किए जा चुके हैं। इससे बैंकों के ट्रेजरी इनकम और कुल मुनाफे पर असर पड़ने की आशंका है।
रुपये में 12 साल की सबसे बड़ी उछाल
RBI के कदमों के बाद रुपये में गुरुवार को पिछले 12 साल से ज्यादा समय की सबसे बड़ी मजबूती देखी गई। रुपया डॉलर के मुकाबले 1.8% तक मजबूत होकर 93.17 पर पहुंच गया। यह बढ़त सितंबर 2013 के बाद सबसे बड़ी है। दो दिन बाद जब करेंसी मार्केट आज फिर से खुला, तो रुपये में यह तेजी देखने को मिली। इससे पहले 30 मार्च को रुपया कुछ समय के लिए 95 प्रति डॉलर के स्तर को पार कर गया था।
ग्लोबल कारणों से भी बना दबाव
बैंकिंग शेयरों पर दबाव सिर्फ घरेलू कारणों से नहीं, बल्कि ग्लोबल परिस्थितियों से भी बढ़ा है। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के चलते कच्चे तेल की कीमतें फिर से बढ़कर 106 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ईरान पर कड़े रुख ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। कच्चे तेल के ऊंचे दाम भारत की इकोनॉमी और बैंकिंग सिस्टम दोनों के लिए जोखिम पैदा करते हैं, जिससे बाजार में नेगेटिव माहौल बनता है।
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