सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) ने कुछ दिन पहले फ्रंट-रनिंग घोटाले के आरोप में केतन पारेख और रोहित सालगांवकर के खिलाफ आदेश जारी किया था। इस आदेश ने लोगों का अनरजिस्टर्ड डार्क पूल प्लेटफॉर्म्स की ओर ध्यान खींचा है, जिसका इस्तेमाल विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPIs) भारत में निवेश के लिए करते हैं। ये प्लेटफॉर्म बड़े इक्विटी सौदों के लिए ऑर्डर मैचिंग की सुविधा देते हैं और FPIs खरीदारों और विक्रेताओं के बीच इंटरमीडियरीज (मध्यस्थ) की भूमिका निभाते हैं। इन प्लेटफॉर्म्स में लिक्विडनेट (Liquidnet) और ITG Posit (अब Virtu Financial के स्वामित्व में) जैसे नाम शामिल हैं। इस मामले से वाकिफ लोगों ने मनीकंट्रोल को यह जानकारी दी।
डार्क पूल प्लेटफॉर्म्स कैसे काम करते हैं?
म्यूचुअल फंड और बीमा कंपनियों जैसे बड़े FPIs आमतौर पर शेयरों को भारी मात्रा में खरीदते या बेचते हैं। जब ये फंड किसी कंपनी में बड़ी हिस्सेदारी खरीदना या बेचना चाहते हैं, तो वे FPIs के बीच एक सही काउंटरपार्टी ढूंढ़ने के लिए डार्क पूल प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल करते हैं। एक बार काउंटरपार्टी मिल जाने के बाद, ये प्लेटफॉर्म भारतीय ब्रोकर को ऑर्डर भेजते हैं, जो स्टॉक एक्सचेंजों पर ऑर्डर को एग्जिक्यूट करतें है। इसके बदले इन प्लेटफॉर्म्स को शेयर बेचने और खरीदने वाले दोनों पक्षों से एक प्रकार का 'फाइंडर फीस' मिलता है।
यहां ये बताना जरूरी है कि FPIs के लिए ऐसे प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करना अवैध नहीं है। हालांकि, कानूनी जानकारों का कहना है कि ये प्लेटफॉर्म SEBI के किसी भी नियमों के दायरे में नहीं आते हैं। एक व्यक्ति ने बताया, "आम तौर पर, अनरजिस्टर्ड प्लेटफॉर्म को शेयर बाजार से जुड़ी गतिविधियों में शामिल होने की इजाजत नहीं होती है। डार्क पूल प्लेटफॉर्म ऑर्डर मैचिंग का काम भी करते हैं। जबकि SEBI के नियमों के तहत केवल रजिस्टर्ड स्टॉक एक्सचेंज ही ऑर्डर मिलान कर सकते हैं।"
उन्होंने बताया कि संस्थागत निवेशकों आम तौर पर खरीद या बिक्री के बड़े ऑर्डर देते हैं। इन ऑर्डर से जुड़ी कोई भी खबर अप्रकाशित मूल्य-संवेदनशील सूचना (UPSI) के बराबर मानी जाती है। यह जानकारी लीक होने पर फ्रंट-रनिंग जैसे मामलों की संभावना बढ़ जाती है।
एक्सपर्ट्स ने यह भी बताया कि SEBI के नियमों के तहत ब्रोकरों को सिर्फ क्लाइंट्स की ओर से दिए गए ऑर्डर को स्वीकार करना होता है। उन्होंने कहा, "इस मामले में, ब्रोकर क्लाइंट के जरिए नहीं बल्कि किसी थर्ड पार्टी के जरिए ऑर्डर स्वीकार कर रहे हैं। ऐसे में केतन पारेख मामले की तरह सूचना लीक होने और फ्रंट रनिंग की भी संभावना है।"
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