लंबी अवधि के मौकों का इस्तेमाल करने के लिए छोटी अवधि के उतार-चढ़ाव को बर्दाश्त करने की क्षमता होनी चाहिए। एडलवाइज ग्रुप के को-फाउंडर राशेश शाह ने यह बात कही। शाह ने इंडिया के फाइनेंशियल मार्केट को काफी करीब से आकार लेते देखा है। बतौर आंत्रप्रेन्योर उन्हें तीन दशकों का अनुभव है। मनीकंट्रोल के फिडेक्स 2026 इवेंट में उन्होंने अपने करियर और शेयर बाजार के बारे में कई दिलचस्प बातें बताईं।
शुरुआत में आंत्रप्रेन्योर बनने में नहीं थी दिलचस्पी
शाह ने कहा कि बिजनेस परिवार से आने के बावजूद उनकी दिलचस्पी आंत्रप्रेन्योर बनने में नहीं थी। उन्होंने कहा, "मेरे पिता एक एमएसएमई आंत्रप्रेन्योर थे। मैं उन्हें काफी मेहनत करते देखता था। मैं सोचता था कि मुझे कड़ी मेहनत नहीं करनी है। मैं पढ़ाई करना, अच्छी नौकरी करना और एसी केबिन में बैठना चाहता था।" लेकिन, 1990 के दशक की शुरुआत में देश में बैलेंस ऑफ पेमेंट क्राइसिस शुरू हुई। इसके बाद सरकार ने रिफॉर्म्स करना शुरू किया।
1990 के दशक की शुरुआत में देश में बड़े बदलाव
उन्होंने कहा, "1990 के दशक की शुरुआत में भारत की फाइनेंशियल इकोनॉमी में बड़े बदलाव हुए। सेबी की शुरुआत 1992 में हुई। एनएसई 1994 में शुरू हुआ। प्राइवेट म्यूचुअल फंड्स की शुरुआत 1994 में हुई और प्राइवेट बैंक 1994 में आए। भारत में बड़ी चीजें हो रही थीं।" उन्होंने कहा कि इस रिफॉर्म्स में भारत में कैपिटल मार्केट्स की बुनियाद रख दी। उसके बाद से 30 सालों में यह मार्केट काफी मजबूत हुआ है। आज विदेशी इनवेस्टर्स बेच रहे हैं और घरेलू इनवेस्टर्स खरीद रहे हैं।
35 सालों में मार्केट ने दिया है 100 गुना रिटर्न
एडलवाइज के को-फाउंडर ने कहा कि इंडिया में हमेशा हमने कुछ-कुछ होते देखा है। ग्लोबल क्राइसिस, जियोपॉलिटिकल टेंशन या घरेलू इवेंट्स। शॉर्ट टर्म में काफी उतारचढ़ाव देखने को मिलता रहा है जबकि लंबी अवधि में यहां काफी मौके हैं। उन्होंने कहा, "भगवान ने हमें दो आंखें दी हैं। एक छोटी अवधि की मुश्किलों को देखने के लिए है तो दूसरा लंबी अवधि के मौकों को पहचानने के लिए है।" उन्होंने कहा कि उन्होंने 1989 में जब अपना करियर शुरू किया था तब बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का इंडेक्स करीब 680 था। आज यह 80,000 है। यह 35 सालों में 100 गुना ग्रोथ है।
इनवेस्टर्स के लिए अनुशासन बहुत जरूरी है
शाह ने कहा कि इनवेस्टर्स और आंत्रप्रेन्योर्स दोनों के लिए इमोशनल डिसिप्लिन और फाइनेंशियल स्ट्रेंथ जरूरी है। उन्होंने कहा कि निवेश में 3 से 5 साल की साइकिल के बारे में सोचना जरूरी है। बिजनेस खड़ा करने में 5 से 8 साल की साइकिल जरूरी है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बारे में उन्होंने कहा कि इससे फाइनेंशियल सर्विसेज में एडवायजरी फंक्शंस का कुछ हिस्सा ऑटोमेट होगा। लेकिन, ह्यूमन एडवाइजर्स का रोल अहम बना रहेगा।