HUL के रॉयल्टी बढ़ाने के प्रस्ताव ने शेयरहोल्डर्स को क्यों किया निराश?
Hindustan Unilever Share : हिंदुस्तान यूनिलीवर के पेरेंट कंपनी यूनिलीवर को दी जाने वाली रॉयल्टी में बढ़ोतरी के बाद शुक्रवार को इसके शेयरों में लगभग 4 फीसदी की गिरावट देखने को मिली थी। भले ही बाद के ट्रेडिंग सेशंस में गिरावट और नहीं बढ़ी, लेकिन शेयर अपनी गिरावट की भरपाई नहीं कर सका। HUL के एमडी और सीईओ संजीव मेहता ने कहा कि जब मैनेजमेंट इनवेस्टर्स के साथ संवाद करेगा तो वे इस प्रस्ताव की अहमियत समझेंगे
Hindustan Unilever Share : हिंदुस्तान यूनिलीवर के पेरेंट कंपनी यूनिलीवर को दी जाने वाली रॉयल्टी में बढ़ोतरी के फैसले से शेयरहोल्डर्स के मन में निराशा है। इसी कारण शुक्रवार को इसके शेयर में लगभग 4 फीसदी की गिरावट देखने को मिली थी, जो उनकी नाराजगी के संकेत हैं। भले ही ट्रेडिंग सेशंस में गिरावट और नहीं बढ़ी, लेकिन शेयर अपनी गिरावट की भरपाई नहीं कर सका। HUL के एमडी और सीईओ संजीव मेहता (Sanjiv Mehta) ने इकोनॉमिक टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि जब मैनेजमेंट इनवेस्टर्स के साथ संवाद करेगा तो वे इस प्रस्ताव की अहमियत समझेंगे।
रॉयल्टी पर क्या हुआ फैसला
HULअपनी सेल्स पर हर साल यूनिलीवर को एक रॉयल्टी देती है। यूनिलीवर की कंपनी में 62 फीसदी हिस्सेदारी है। एचयूएल 10 साल के एग्रीमेंट के तहत उसके ट्रेडमार्क, ब्रांड, टेक्नोलॉजी और सर्विसेज का इस्तेमाल करती है। यह एग्रीमेंट 31 जनवरी, 2023 को खत्म हो रहा है।
HUL को बदले में यूनिलीवर की ओनरशिप वाले ट्रेडमार्क/ ब्रांड, टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल का अधिकार और सेंट्रल सर्विसेज (कच्चे माल की वैश्विक खरीद) तक पहुंच हासिल होती है।
इस प्रकार वित्त वर्ष 22 में कंपनी ने यूनिलीवर को सेल्स का 2.65 फीसदी या 1,336 करोड़ रुपये का पेमेंट किया। यही प्रभावी दर है, क्योंकि स्थानीय स्तर पर खरीदे गए ब्रांडों का ट्रेडमार्क एचयूएल के पास है और ये इस गणना में शामिल नहीं हैं।
नए प्रस्ताव के तहत फरवरी 2023 से लागू नए 5 साल के एग्रीमेंट के तहत रॉयल्टी बढ़कर 3.45 फीसदी हो जाएगी।
इसकी वजह बताते हुए, HUL ने कहा कि उसे यूनिलीवर से कई बेनिफिट मिले हैं और आगे भी मिलते रहेंगे। एचयूएल का रेवेन्यू बीते 10 साल में दोगुना हो गया है और उसका एबिटडा मार्जिन 10 फीसदी प्वाइंट बढ़ गया है। हालांकि, कंपनी के तर्क से शेयरहोल्डर्स प्रभावित नहीं हुए हैं।
रॉयल्टी पर क्या है आम राय
दरअसल, इन बढ़ोतरी से पहले भी इनवेस्टर्स कभी यह समझ नहीं पाए कि विदेशी मालिकाना हक वाली भारतीय कंपनियां अपनी पेरेंट कंपनियों को रॉयल्टी क्यों देती हैं। वे पहले से मेजॉरिटी होल्डिंग के चलते मोटा डिविडेंड उठा रही हैं। HUL का यूनिलीवर के लिए खासा योगदान है, जो वॉल्यूम के लिहाज से सबसे बड़ी सब्सिडियरी है।
ये स्टॉक्स आम तौर पर अन्य घरेलू कंज्यूमर कंपनियों की तुलना में प्रीमियम पर कारोबार करते हैं।
इनवेस्टर्स की क्या हैं चिंताएं
ज्यादा रॉयल्टी का मतलब है कि एचयूएल की अर्निंग्स प्रति शेयर घट जाएगी। यह शेयर में गिरावट से भी जाहिर होता है। जेफ्रीज ने एक नोट में कहा कि मार्केट में इस फैसले के चलते वित्त वर्ष 23 में उसके ईपीएस में 2 फीसदी और वित्त वर्ष 24 में 4 फीसदी की गिरावट पर आम सहमति है।
एचयूएल की सेल्स दोगुनी होने और एबिटडा बढ़ने की दलील पर इनवेस्टर्स भी तर्क दे सकते हैं कि इससे उसकी रॉयल्टी इनकम भी खासी बढ़ी है।
फिर,जहां तक पेरेंट्स के फाइनेंशियल्स में योगदान की बात है तो उसे अच्छा डिविडेंड मिला और यहां तक कि जीएसके कंज्यूमर को खरीदने के लिए एचयूएल के शेयरों का प्राइमरी करेंसी के रूप में उपयोग करके किया गया था।
एग्रीमेंट के 10 साल की जगह 5 साल करने का एक मतलब यह भी है कि आगे रॉयल्टी और बढ़ सकती है। Jefferies ने एक नोट में कहा कि कुछ इनवेस्टर्स का मानना है कि अतिरिक्त रॉयल्टी बढ़ी हुई सेल्स पर लगनी चाहिए। उसकी रेवेन्यू ग्रोथ पीयर कंपनियों से खास अलग नहीं है।
आगे क्या होगा
शुरुआती गिरावट के बाद फिलहाल शेयर प्राइस स्थिर है। बहरहाल, कंपनी अपने प्रस्ताव अडिग रहती दिख रही है। देखना होगा कि इंस्टीट्यूशनल इनवेस्टर्स कैसी प्रतिक्रिया देते हैं और क्या वे इस रॉयल्टी में बढ़ोतरी का विरोध करें। हालांकि, कानूनी रूप से उनकी मंजूरी की जरूरत नहीं है।
कुल मिलाकर, HUL के प्रबंधन को ऊंची कॉस्ट के लिए इनवेस्टर्स को मनाना है और अच्छे रिटर्न की प्रतिबद्धता जाहिर करनी होगी।