MK Ventures के फाउंडर और भारत के जाने-माने निवेशक मधु केला ने CNBC-TV18 के साथ सरकारी और निजी बैंकों के प्रदर्शन और सेक्टर में अभी तक हुई एनपीए की सफाई पर बात करते हुए कहा कि मैं अक्सर सही मौके को देखते हुए अपना दांव जल्दी खेलने के पक्ष में रहता हूं। बस में भीड़ बढ़ने के पहले ही अपनी सीट पकड़ लेने में भलाई होती है। अगर आप बैंकों के प्रदर्शन पर नजर डालें तो पिछले 3 सालों में प्राइवेट बैंकों ने 23 फीसदी निगेटिव रिटर्न दिया है। वहीं, अगर सरकारी बैंकों पर नजर डालें तो इन्होंने एक बास्केट के तौर पर सपाट प्रदर्शन किया है। इसकी वजह एबीआई का अच्छा प्रदर्शन रहा है।
अगर बैंकिंग सेक्टर की बड़ी पिक्चर पर नजर डालें तो 2015 में आरबीआई के दखल के बाद बैंकिंग सेक्टर की सफाई शुरू हुई। पिछले 8 सालों के दौरान बैंकिंग सेक्टर में बड़ी मात्रा में एनपीए की सफाई हुई है। इसके लिए सरकारी बैंकों ने इस अवधि में 12.9 लाख करोड़ रुपए की प्रॉविजनिंग की है। वहीं, इसी अवधि में इनका कुल ऑपरेटिंग प्रॉफिट 12.4 लाख करोड़ रुपए रहा है। ऐसे में देखें तो सरकारी बैंकों को ऑपरेटिंग प्रॉफिट लेवल पर 50,000 करोड़ रुपए का घाटा हुआ है। ये सरकारी बैंकों के पिछले 8 साल के ओवरऑल एवरेज बुक का 20 फीसदी होता है।
अह अगर आप प्राइवेट बैंकों पर नजर डालें तो इन्होंने काफी अच्छा काम किया है। इन्होंने एनपीए की सफाई के लिए 3.25 लाख करोड़ रुपए का प्रावधान किया है और इन ऑपरेटिंग प्रॉफिट लेवल 8.75 लाख करोड़ रुपए है।
सरकारी बैंकों में कहां बन रहे निवेश के मौके? इस सवाल का जवाब देते हुए मधु केला ने कहा कि अभी मैं छोटे सरकारी बैंकों के पक्ष में नहीं हूं क्योंकि बड़े बैंक काफी सस्ते में मिल रहे हैं। ये अपने बुक के 0.5 से 1 गुना पर ट्रेड कर रहे हैं। ऐसे में हमें बैंकिंग सेक्टर में बहुत गहरे जानें की जरूरत नहीं है। बडें नामों पर दांव लगाएं।
उन्होंने आगे कहा कि हमें PSU बैंकों में आगे बड़ा कंसोलीडेशन होता नजर आ सकता है। पहले 32 सरकारी बैंक थे। अब सिर्फ 12 रह गए हैं। अगर सरकार अपने गाइडेंस के हिसाब से काम करती है तो अगले 3 साल में 10 सरकारी बैंक रह जाएंगे। ऐसे में पहले ही काफी कंसोलीडेशन हो चुका है। अगर आप इनमें से टॉप थ्री पीएसयू बैंकों को चुनें तो मैं इनमें से सबसे बेहतर नामों के पक्ष में जाना पसंद करूंगा।
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