भारत में बैंकों को ट्रेडिंग के सबसे मशहूर तरीके रुपी ऑफशोर को ऑफर करने से रोक दिया गया है। इससे हर दिन बाजार पर $14.9 हजार करोड़ का दबाव पड़ने की आशंका है। वहीं केंद्रीय बैंक RBI ने यह कदम गिरते रुपये को संभलाने के लिए सख्ती के तौर पर उठाया है। भारतीय रिजर्व बैंक ने सट्टेबाजी पर रोक लगाने और रुपये को सहारा देने के लिए पिछले एक दशक में सबसे कड़े कदमों में से एक उठाया है। यह फैसला ऐसे समय में आरबीआई ने लिया, जब इस वर्ष रुपया लगातार रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचता रहा। ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच चल रही लड़ाई से रुपये पर दबाव और बढ़ा है।
RBI ने क्या कदम उठाए और रुपये पर क्या असर पड़ा?
शुक्रवार को आरबीआई ने लेंडर्स के डेल ऑनशोर करेंसी पोजिशंस की अधिकतम सीमा $10 करोड़ तय कर दी। इस फैसले से बैंकों को कम से कम $3000 करोड़ के आर्बिट्राज ट्रेड को फटाफट बंद करना पड़ा। जब इससे भी रुपये की गिरावट नहीं रुकी, तो बैंकों को कुछ नॉन-डिलीवेरेबल डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स देने से मना कर दिया गया, जोकि ऑफशोर में औसतन $14.9 हजार करोड़ प्रतिदिन का बाजार है या्नी कि ऑनशोर मार्केट से लगभग दोगुना। दो दिनों की छुट्टियों के बाद जब करेंसी ट्रेडिंग शुरू हुई, तो गुरुवार को रुपये में 12 वर्षों की सबसे बड़ी तेजी दिखी। यह करीब 2% बढ़कर प्रति डॉलर 93.25 पर पहुंच गया, जबकि इससे पहले हफ्ते की शुरुआत में यह 95 प्रति डॉलर से ऊपर रिकॉर्ड निचले स्तर पर था।
क्या कहना है एक्सपर्ट्स का?
ICICI सिक्योरिटीज प्राइमरी डीलरशिप के इकनॉमिस्ट अभिषेक उपाध्याय का कहना है कि आरबीआई के फैसले से संकेत मिल रहा है कि वह कड़े फैसले लेने के लिए तैयार है, और फिलहाल उसका ध्यान लिक्विडिटी की बजाय रुपये की स्थिरता पर है। हालांकि उनका कहना है कि इससे करेंसी मार्केट को मजबूत करने और प्राइस डिस्कवरी में सुधार करने की वर्षों की मुहिम कमजोर हो सकती है। उनका कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में ऑनशोर और ऑफशोर मार्केट में लिक्विडिटी काफी बढ़ी है जिसने विदेशी निवेशकों को आकर्षित किया। उन्होंने आशंका जताई कि अगर लंबे समय तक सख्ती बनी रही तो लागत बढ़ सकती है जिससे निवेशकों और बिजनेसेज को करेंसी रिस्क को हेज करने में दिक्कत हो सकती है।
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