Mutual Funds: म्यूचुअल फंड्स को लेकर कुछ चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। एक डेटा से पता चला है कि शेयर बाजार की करीब 90% कंपनियों में म्यूचुअल फंड्स पैसा ही नहीं लगाते हैं। आपने SIP के जरिए कोई ने कोई म्यूचुअल फंड्स स्कीम जरूर खरीदा होगा। देश में इस कुल 427 एक्टिव म्यूचुअल फंड्स स्कीमें हैं। इसमें से 95% स्कीमों ने सिर्फ 382 शेयरों में पैसा लगाया हुआ है। इसे ऐसे समझिए कि शेयर बाजार में कुल 4,000 से अधिक कंपनियों के शेयर सूचीबद्ध हैं, लेकिन फंड मैनेजर इसमें सिर्फ 400 यानी 10 फीसदी शेयरों को ही निवेश के लिए बार-बार चुने रहे हैं।
एकॉर्ड फिनटेक और कैपिटलाइमाइंड ने मिलकर म्यूचुअल फंड इंडस्ट्रीज से जुड़े कुछ आंकड़े जुटाए हैं। इस आंकड़े से पता चलता है कि करीब 95 फीसदी एक्टिव म्यूचुअल फंड्स ने मिलकर सिर्फ 382 शेयरों में निवेश किया हुआ है। वहीं अगर निवेश की राशि को देखें तो, इनके कुल फंड्स का करीब 80 फीसदी पैसा सिर्फ 178 शेयरों में और 60 फीसदी पैसा सिर्फ 79 स्टॉक्स में लगा हुआ है।
इस बारे में जब कैपिटलमाइंड्स के फाउंडर दीपक शिनॉय से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि इससे म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री की एक बड़ी समस्या पता चलता है। इंडस्ट्री की पैठ सिर्फ बाजार के सीमित स्टॉक्स तक है। इंडस्ट्री में जो SIP और लंपसम के जरिए पैसा आ रहा है, उसका कुछ हिस्सा ही स्मॉलकैप शेयरों में जा रहा हहै। अधिकतर फंड मैनेजर बड़े शेयरों को ही पैसा लगान के लिए चुन रहे हैं। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण लिक्विडिटी का है।
शीनॉय ने इस लिक्विडिटी की समस्या को भी समझाया। उन्होंने कहा कि इस समय देश का जो सबसे बड़ा स्मॉलकैप फंड है, उसके पास करीब 37,000 करोड़ रुपये की राशि हैं। लेकिन इसके उलट आ जो सबसे बड़ा स्मॉलकैप स्टॉक है, उसकी आज की तारीख कुल मार्केट वैल्यू महज 17,000 करोड़ रुपये है।
इसका मतलब है कि अगर 37,000 करोड़ रुपये वाला फंड मैनेजर अगर अपना सिर्फ 1% पैसा इस शेयर में लगाएगा, तो उसे कंपनी की 2% हिस्सेदारी मिल जाएगी। और यही पर समस्या आ जाती है। पहली बात कि इन स्मॉलकैप शेयरों में प्रमोटरों की हिस्सेदारी काफी अधिक होती है, ऐसे में बड़ी हिस्सेदारी लेने में दिक्कत आती है। ऐसे में इन शेयरों के कई बार बड़ी संख्या में खरीदार नहीं होते हैं, ऐसे में इनसे जरूरत पड़ने पर निकलने में दिक्कत होती है।
कैपिटल माइंड की वशिष्ठा अय्यर ने भी इससे सहमति जताई है, जितना बड़ा फंड होता है और उसे शानदार रिटर्न हासिल करने में उतनी दिक्कत आती है। उन्होंने कहा कि इसमें समस्या फंड मैनेजर्स के कौशल की नहीं है, बल्कि कारोबार के तरीके की है। एक एक्टिव म्यूचुअल फंड औसतन करीब 50 शेयरों में निवेश करते हैं और 80 प्रतिशत इंडस्ट्री का निवेश कुल करीब 180-190 शेयरों में है। मतलब फंड मैनेजर मार्केट में मौजूद 20-25 फीसदी शेयरों को खरीद रहा है।
मार्च तक के आंकड़े के मुताबिक, म्यूचुअल फंड के पास भारत की कुल सूचीबद्ध कंपनियों की सिर्फ करीब 8.7 फीसदी हिस्सेदारी थी। वहीं इसके मुकाबले विदेशी संस्थागत निवेशकों यानी FII के पास 19 प्रतिशत और रिटेल निवेशकों के पास 9.4 प्रतिशत थी।