Online Dabba Trading: ज्यादा प्रॉफिट के लिए आप ऑनलाइन डब्बा ट्रेडिंग के जाल में तो फंसने नहीं जा रहे? जानिए कैसे पर्दे के पीछे होता है यह धंधा

ऑनलाइन डब्बा ट्रेडिंग: डब्बा ट्रेडिंग सिक्योरिटीज का अवैध मार्केट है। इसके लिए कोई रेगुलेशन नहीं हैं। इसमें ऑपरेटर्स लोगों को प्राइस मूवमेंट्स पर दांव लगाने के मौके देते हैं। किसी स्टॉक में निवेश करने में रिस्क होता है, लेकिन डब्बा ट्रेडिंग में रिस्क ज्यादा होता है, क्योंकि इंटरमीडीयरजी या ऑपरेटर्स दिन के आखिर में ट्रेड को सेटल करने से इनकार कर सकते हैं। ऐसे में प्रॉफिट बनाने के बावूजद इनवेस्टर्स के हाथ में कुछ नहीं नहीं आता है

अपडेटेड Jul 20, 2023 पर 3:45 PM
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डब्बा ट्रेडर्स आम तौर पर अपने सर्विसेज को ऐडवर्टाइज नहीं करते हैं और केवल रेकोमेंडशंस के आधार पर क्लाइंट्स को इनरॉल करते हैं।

Online Dabba Trading: ऑनलाइन डब्बा ट्रेडर्स (Dabba Traders) खुलकर अपने सब-ब्रोकर्स बना रहे हैं। वे ज्यादा ब्रोकरेज फीस और क्लाइंट्स को ज्यादा लीवरेज के वादे कर रहे हैं। डब्बा ट्रेडिंग (dabba trading) सिक्योरिटीज का अवैध मार्केट है। इसके लिए कोई रेगुलेशन नहीं हैं। इसमें ऑपरेटर्स लोगों को प्राइस मूवमेंट्स पर दांव लगाने के मौके देते हैं। किसी स्टॉक में निवेश करने में रिस्क होता है, लेकिन डब्बा ट्रेडिंग में रिस्क ज्यादा होता है, क्योंकि इंटरमीडीयरजी या ऑपरेटर्स दिन के आखिर में ट्रेड को सेटल करने से इनकार कर सकते हैं। ऐसे में प्रॉफिट बनाने के बावूजद इनवेस्टर्स के हाथ में कुछ नहीं नहीं आता है।

डब्बा ट्रेडिंग ऐप पर पैसे गंवाने वाले एक ट्रेडर ने मनीकंट्रोल को बताया, "आप पैसे गंवाते हैं, जबकि डब्बा-ट्रेडिंग ऐप्स/बिजनेसेज 'ब्रोकरेज फीस' के रूप में पैसे कमाते हैं। आप प्रॉफिट बनाते हैं, वे ज्यादा पैसे कमाते हैं... क्योंकि उनके लिए पेमेंट करना जरूरी नहीं होता है।"

सब-ब्रोकर्स के जरिए फंसाए जाते हैं क्लाइंट्स


डब्बा ट्रेडर्स आम तौर पर अपने सर्विसेज को ऐडवर्टाइज नहीं करते हैं और केवल रेकोमेंडशंस के आधार पर क्लाइंट्स को इनरॉल करते हैं। लेकिन, ऑनलाइन डब्बा ट्रेडर्स के काम करने का तरीका पूरी तरह से अलग नजर आता है। ऑनलाइन डब्बा ट्रेडर्स की विश्वसनीयता नहीं होती है। इसलिए उन्हें ऐसे लोगों की जरूरत होती है जो अपने सर्किल के लोगों को एक बार हाथ आजमाने के लिए तैयार कर सके। यहीं से सब-ब्रोकर्स की एंट्री होती है। सब-ब्रोकर्स को ज्यादा कमाई का लालच दिया जाता है।

सब-ब्रोकर्स को ज्यादा फीस की लालच

मनीकंट्रोल ने एक ऐप को ट्राइ करने के बाद पाया कि फीस हर लॉट के लिए वसूली जाती है। रेगुलेशन के तहत आने वाले ब्रोकरेज प्लेटफॉर्म्स हर ऑर्डर पर फीस लेते हैं। एक ऑर्डर में कई लॉट हो सकते हैं। इनवेस्टर्स को यह कहकर लुभाया जाता है कि उन्हें ज्यादा लेवरेज की सुविधा मिलेगी और उन्हें टैक्स भी नहीं चुकाना पड़ेगा। इस मार्केट की अंदर की जानकारी रखने वाले एक सूत्र ने बताया, "टैक्स से छूट का वादा रिटेल इनवेस्टर्स को बहुत अट्रैक्टिव लगता है। वे 30 फीसदी प्रॉफिट टैक्स के रूप में गंवाना नहीं चाहते।"

पर्दे के पीछे चलता है यह धंधा

ऐप को डाउनलोड करने का लिंक आसानी से उपलब्ध नहीं है। इसे तभी भेजा जाता है जब कोई फोन नंबर ऐप प्रोवाइडर को रेकमेंड किया जाता है। मनीकंट्रोल ने यह जानने के लिए कि यह धंधा कैसे होता है, सब-ब्रोकर बनने में दिलचस्पी दिखाई। उसके बाद उसे ऐसे एक ऐप का एक्सेस मिला।

ऐसे चलता है पूरा खेल

मनीकंट्रोल के रिपोर्टर का फोन नंबर एक ऐप प्रोवाइडर के पास भेजा गया। उसके बाद रिपोर्टर को एक लिंक मिला। इसमें .apk एक्सटेंशन था, जो गूगल प्ले पर नहीं मिलेगा। इसके बाद रिपोर्टर को सब-ब्रोकरेज बिजनेस ऑफर किया गया, जिसमें प्लेटफॉर्म Trade Dost को ब्रोकरेज से होने वाली कमाई का 40-50 फीसदी शेयर करने का वादा किया गया। इस प्लेटफॉर्म पर ब्रोकरेज चार्ज बहुत ज्यादा है। यह NSE Options के हर लॉट के लिए 40 रुपये और NSE Currency के हर लॉट के लिए 20 रुपये है। एक रेगुलेटेड ब्रोकरेज प्लेटफॉर्म पर यह प्रति ऑर्डर 20 रुपये है। ट्रेड दोस्त प्लेटफॉर्म क्रिप्टोकरेंसी पर भी दांव लगाने का मौका देता है। इसके लिए एक करोड़ रुपये के हर ट्रांजेक्शन पर 5,000 रुपये की फीस वसूली जाती है।

सब-ब्रोकर्स से यह भी कहा जाता है कि क्लाइंट्स को इंट्राडे सेगमेंट में क्लाइंट्स को 500 गुना तक लेवरेज का मौका दिया जाएगा, जबकि कैरी-फॉरवर्ड ट्रेड्स में यह 60 गुना होगा।

एक सब-ब्रोकर को कम से कम पांच क्लाइंट्स प्लेटफॉर्म पर लाना जरूरी है। एक बार ऐसा होने पर उसे ऐप पर एक पैनल दिया जाता है, जिसके जरिए वह क्लाइंट्स के ट्रेड को मॉनिटर कर सकता है और यह देख सकता है कि इससे उसके अकाउंट (सब-ब्रोकर के अकाउंट) में कितने पैसे आ रहे हैं।

रिपोर्टर्स के थोड़ा जोर देने पर पैनल का एक्सेस पाने के लिए कम से कम चार क्लाइंट्स की शर्त में रियायत देकर तीन क्लाइंट्स कर दिया गया। किसी क्लाइंट को साइन-ऑन करने के लिए सब-ब्रोकर को उससे एक मिनिमम अमाउंट सर्विस प्रोवाइडर के अकाउंट में ट्रांसफर करना होता है। इस मामले में ऐप ने एक गूगल पे नंबर पर पेमेंट लिया। गूगल पे का यह अकाउंट एचडीएफसी बैंक के अकाउंट (UPI ID: pnkjydv0123@okhdfcbank) से लिंक था।

उसके बाद अमाउंट प्लेटफॉर्म पर क्लाइंट के अकाउंट में दिखने लगा। हालांकि, यहां एक पे-इन टैब दिया गया है लेकिन क्लाइंट सीधे अपने अकाउंट में पैसे नहीं भेज सकता है। पैसा सब-ब्रोकर के बैंक अकाउंट के जरिए जाता है। इस मामले में यह अकाउंट पंकज यादव का था।

क्लाइंट अकाउंट में कम से कम 25,000 रुपये का बैलेंस होना चाहिए। हालांकि, न्यूनतम 1000 रुपये से ट्राइ करने का ऑप्शन है, जिसे बाद में बढ़ाना पड़ता है। क्लाइंट की सुविधा के लिए प्लेटफॉर्म का डेमो वीडियो भी उपलब्ध है। इसकी मदद से यह बताया जाता है कि ऐप के अलग-अलग फंक्शन किस तरह काम करते हैं।

यह ऐप एक नोट के साथ ओपन होता है, जिसमें बताया जाता है कि यह सिर्फ ट्रेनिंग के लिए है। इसमें इस्तेमाल में आसान इंटरफेस है और रिटल-टाइम प्राइस फीड्स है।

मार्केट रेगुलेटर की तरफ डब्बा ट्रेडिंग रोकने के लिए रियल-टाइम प्राइस फीड्स उपलब्ध कराने की मनाही है। लेकिन, कुछ अथॉराइज्ड फर्म्स एक्सचेंज से प्राइस फीड्स खरीदती हैं और इसे ऐसे प्लेटफॉर्म्स को बेच देती हैं।

कोट्स, ट्रेड्स, पोर्टफोलियो परफॉर्मेंस को देखने के लिए कई टैब हैं। एक लेजर मास्टर है जो यह बताता है कि अब तक कितना प्रॉफिट या लॉस हुआ है।

इसका ऑनलाइन वर्जन ऑफलाइन वर्जन के मुकाबले सुविधाजनक लगता है लेकिन इसकी पहचान छुपे होने के चलते यह ऑफलाइन वर्जन के मुकाबले ज्यादा खतरनाक है। ऊपर जानकारी देने वाले ट्रेडर ने इस बारे में बताया, जिसे ऐसे ऐप पर 40,000 रुपये का नुकसान हो चुका है। उसने कहा, "अगर आप डब्बा ट्रेडिंग में चाहे ऑनलाइन या ऑफलाइन, पैसे गंवा देते हैं तो आप कहां शिकायत करेंगे?" अब यह ट्रेडर्स टेलीग्राम चैनल्स पर दूसरों को इस जाल में नहीं फंसने की नसीहत देने की कोशिश करता रहता है।

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