मार्केट अपने रिकॉर्ड ऊंचाई से काफी नीचे आ चुका है। यह गिरावट कई लोगों के लिए खरीदारी का बड़ा मौका है। किसी स्टॉक को बॉटम (सबसे कम प्राइस) पर खरीदने का आइडिया बहुत लुभावना है। मान लीजिए आप किसी स्टॉक को उसके बॉटम के नजदीक खरीदते हैं तो कीमतों में रिकवरी आने पर आप दूसरों से पहले मुनाफा कमाने की स्थिति में होंगे। इसलिए अगर आपका दिमाग यह कहता है कि मार्केट बहुत ज्यादा गिर चुका है तो उस पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत नहीं है।
इनवेस्टर्स को खराब खबरों से घबराने की जरूरत नहीं है। सच यह है कि मार्केट में गिरावट सिर्फ एक शुरुआत है। मार्केट से जुड़े डेटा आपको कुछ संकेत देते हैं। मार्केट वाइड पॉजिशन लिमिट (MWPL) इनमें से एक है। दूसरा, मार्जिन फंडिंग (MTF) है। तीसरा मार्जिन सेलिंग है। चौथा ओवरहेड सप्लाई है। ये डेटा मार्केट को समझने में आपकी मदद कर सकते हैं। आइए इनके बारे में विस्तार से जानते हैं।
मार्जिन फंडिंग को 'बाय नाउ पे लेटर' भी कहा जाता है। NSE से यह डेटा मिल जाता है। अभी यह डेटा बताता है कि रिटेल इनवेस्टर्स अब भी उस पैसे से अपने लॉन्ग पॉजीशन बनाए हुए हैं, जो उधार लिया गया है। इसका मतलब है कि इस पैसे पर उनका इंटरेस्ट लगातार बढ़ रहा है। पिछले 30 महीनों में MTF 153 फीसदी बढ़ा है। यह ध्यान में रखने की जरूरत है कि जब शेयरों की कीमतें गिरती हैं तब यह एमटीएफ आपको लिए दो तरह से मुसीबत पैदा करता है। ब्रोकर आपसे अतिरिक्त मार्जिन डिमांड करता है। साथ ही वह स्टॉक्स पर हेयरकट डिमांड करता है।
इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। मान लीजिए आपने एक स्टॉक 100 रुपये के प्राइस पर खरीदा है। ब्रोकर ने इसे खरीदने के लिए आपको 75 रुपये दिया है। बाकी 25 रुपये आपने लगाए हैं। जब इस स्टॉक की कीमत गिरकर 50 रुपये पर आ जाती है तब ब्रोकर आपसे 25 रुपये का नोशनल लॉस और Extreme Loss Margin (ELM) डिमांड करेगा। इससे बुल्स पर भारी दबाव बन जाता है।
हमेशा कुछ ट्रेडर्स ऐसे होते हैं, जो मार्जिन कॉल को पूरा नहीं कर पाते हैं। ऐसे में ब्रोकर उनकी पोजीशन लिक्विडेट कर देता है। वह ऐसा सेबी के नियमों के तहत करता है। एक साथ ट्रेडर्स के बड़ी संख्या में मार्केट से एग्जिट करने की यह एक बड़ी वजह होती है। ब्रोकर्स का बैक-ऑफिस सॉफ्टवेयर अकाउंट से ऐसे स्टॉक्स को बेचना शुरू कर देता है, जिसमें डेबिट (डेफिसिट) बैलेंस दिखता है। इससे मार्केट में सिस्टम बेस्ड सेलिंग होती है।
मान लीजिए कोई रिटेल ट्रेडर समय पर मार्जिन कॉल का पेमेंट कर देता है जिससे वह ऑटो-सेल ऑफ से बच जाता है। इससे बड़ी गिरावट के दौरान भी उसका निवेश मार्केट में बना रहता है। जब रिकवरी आने पर कीमतें चढ़ती हैं तो बड़ी संख्या में इनवेस्टर्स अपने स्टॉक्स को बेचना शुरू करते हैं। हायर लेवल पर इस सेलिंग को 'overhead supply' कहते हैं।
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जब मार्जिन कॉल की वजह से होने वाली सेलिंग खत्म हो जाएगी, जब ओवरहेड सप्लाई पूरी हो जाएगी और नई आक्रामक खरीदारी शुरू हो जाएगी तब मार्केट में तेजी देखने को मिलेगी। अगर आप सही वक्त से पहले खरीदारी शुरू कर देते हैं तो इसका मतलब है कि आप अंधेरे में तीर चला रहे हैं। दरअसल, मार्केट आपको डेटा के जरिए कई अहम जानकारियां देता है। कोई समझदार ट्रेडर इससे यह अंदाजा लगा सकता है कि खरीदारी का सही समय क्या है। आपको ऐसे समय का इंतजार करना चाहिए और तब तक अपने पैसे को बचाकर रखना चाहिए।
(लेखक एक सिस्टम बेस्ड प्रॉपरायटरी ट्रेडिंग फर्म के सीईओ हैं। यहां वक्त विचार उनके निजी विचार हैं। इसका इस पब्लिकेशन से कोई संबंध नहीं है।)