अमेरिका की छवि दूसरे देशों से अलग रही है। इसे प्रतिद्वंद्वी देशों के मुकाबले ताकतवर माना जाता रहा है। इस वजह से यह दुनिया का नेतृत्व करता रहा है। लेकिन, अब ज्यादातर एक्सपर्ट्स की धारणा अमेरिका को लेकर बदल रही है। राजनीतिक, कूटनीतिक और सामरिक मामलों में अमेरिका के सुपरपावर दर्जे को अब संदेह की नजरों से देखा जा रहा है। लेकिन, इनवेस्टमेंट की दुनिया में आज पहले से ज्यादा अट्रैक्टिव दिख रहा है।
अमेरिकी फाइनेंशियल मार्केट्स में बढ़ा है भरोसा
अमेरिकी फाइनेंशियल मार्केट्स (US Financial Markets) की ताकत में एक्सपर्ट्स का भरोसा बढ़ा है। अमेरिकी इकोनॉमी (US Economy) का प्रदर्शन दुनिया की दूसरी इकोनॉमी से बेहतर रहने की उम्मीद है। ग्लोबल इनवेस्टर्स अमेरिका में आज जितना निवेश कर रहे हैं, उतना शायद ही पहले कभी किया होगा। अमेरिकी स्टॉक मार्केट्स (US Stock Markets) का प्रदर्शन दुनिया के दूसरे बाजारों से बेहतर है। प्रमुख ग्लोबल स्टॉक इंडेक्स में अमेरिकी की हिस्सेदारी करीब 70 फीसदी है। यह 1980 के दशक के मुकाबले 30 फीसदी ज्यादा है।
नई टेक्नोलॉजी में अमेरिकी कंपनियां अव्वल
कई मानकों पर आज डॉलर की वैल्यू हाई है। बीते 50 सालों में शायह ही डॉलर की वैल्यू कभी इतनी हाई रही है। अमेरिका और बाकी दुनिया की वैल्यूएशन के बीच के फर्क को एक्सपर्ट्स सही ठहरा रहे हैं। इसकी वजह दिग्गज अमेरिकी कंपनियों की अर्निंग्स पावर है। नई टेक्नोलॉजी में अमेरिकी कंपनियों का बड़ा योगदान है। अमेरिकी कंपनियों की पहुंच दुनियाभर में है। ये चीजें अमेरिका को ताकतवर बनाती हैं। ग्लोबल इकोनॉमी में अमेरिकी इकोनॉमी की हिस्सेदारी भले ही 27 फीसदी है, लेकिन ग्लोबल स्टॉक मार्केट्स में इसकी हिस्सेदारी काफी ज्यादा है।
डोनाल्ड ट्रंप की पॉलिसी से मार्केट में आएगी तेजी
अब नजरें डोनाल्ड ट्रंप पर लगी हैं जो अमेरिका के नए राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं। इनवेस्टर्स का मानना है कि टैरिफ बढ़ाने, टैक्स घटाने और नियमों को आसान बनाने से अमेरिकी मार्केट्स में तेजी आएगी। ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस के बाद से अमेरिकी मार्केट्स का प्रदर्शन दूसरे बाजारों से बेहतर रहा है। राष्ट्रपति चुनावों में ट्रंप की जीत के बाद नवंबर में अमेरिकी मार्केट में शानदार तेजी देखने को मिली।
अमेरिका में निवेश करने में बढ़ रही दिलचस्पी
ऐसा लगता है कि अमेरिका दुनिया में निवेश के लिए एकमात्र विकल्प है। एशिया और यूरोप में लोग अमेरिकी मार्केट्स को शानदार संभावना वाले बाजार के रूप में देख रहे हैं। मुबंई में फाइनेंशियल एडवाइजर्स इंडिया से बाहर डायवर्सिफिकेशन के लिए अमेरिकी मार्केट्स में निवेश की सलाह दे रहे हैं, जो इंडियन मार्केट्स से भी ज्यादा महंगा है। सवाल है कि क्या अमेरिकी में किसी तरह का बुलबुला (Bubble) बना है? साल 2000 में डॉट कॉम बुलबुले के दौरान भी अमेरिकी मार्केट्स काफी महंगे हो चुके थे।
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अमेरिकी बॉन्ड्स में रिकॉर्ड निवेश
यूरोप और जापान के मुकाबले अमेरिकी इकोनॉमी की ग्रोथ ज्यादा है। हालांकि, कई विकासशील देशों की ग्रोथ के मुकाबले यह कम है। फिर भी आज यह जिस प्रीमियम पर है, उतना शायद ही पहले कभी देखा गया। 2024 में विदेशी निवेशकों ने अमेरिकी बॉन्ड्स में करीब 1 लाख करोड़ डॉलर निवेश किया है। यह यूरोजोन के बॉन्ड्स में निवेश के मुकाबले करीब दोगुना है। इनवेस्टर्स यह मानते हैं कि प्राइस और सेंटिमेंट तय करने में फंडामेंटल्स का बड़ा हाथ होता है। लेकिन, ऐसा समय आता है जब सेंटिमेंट्स फंडामेंटल्स को तय करने लगते हैं।