Hindustan Zinc में अपनी हिस्सेदारी जल्द बेचे सरकार, कंपनी बोर्ड से चलनी चाहिए, सरकार से नहीं- Vedanta

वेदांता (Vedanta) के चेयरमैन अनिल अग्रवाल ने सरकार को हिंदुस्तान जिंक (Hindustan Zinc) में अपनी 29 फीसदी हिस्सेदारी बेचने को कहा है। अनिल के मुताबिक करीब 20 साल पहले हिंदुस्तान जिंक में अपनी हिस्सेदारी 100 फीसदी बेचने पर सरकार सहमत हुई थी लेकिन अभी तक ये नहीं हो सका है। वेदांता के मालिक का कहना है कि सरकार को इस प्रक्रिया में तेजी लानी चाहिए

अपडेटेड Mar 06, 2023 पर 10:57 AM
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Vedanta के चेयरपर्सन अनिल अग्रवाल का कहना है कि उनका सिर्फ एक ही लक्ष्य है, Hindustan Zinc के कारोबार को दोगुना करना। अगर सरकार अपनी हिस्सेदारी बेच देती है तो कंपनी बड़े फैसले ले सकेगी।
     
     
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    वेदांता (Vedanta) के चेयरमैन अनिल अग्रवाल ने सरकार को हिंदुस्तान जिंक (Hindustan Zinc) में अपनी 29 फीसदी हिस्सेदारी बेचने को कहा है। अनिल के मुताबिक करीब 20 साल पहले हिंदुस्तान जिंक में अपनी हिस्सेदारी 100 फीसदी बेचने पर सरकार सहमत हुई थी लेकिन अभी तक ये नहीं हो सका है। वेदांता के मालिक का कहना है कि सरकार को इस प्रक्रिया में तेजी लानी चाहिए। उनका दावा है कि सरकार इस विनिवेश के जरिए 40 हजार-50 हजार करोड़ रुपये जुटा सकती है। सीएनबीसी-टीवी18 से बातचीत में उन्होंने कहा कि किसी कंपनी को बोर्ड के जरिए चलना चाहिए ना कि सरकार के जरिए।

    क्यों चाहते हैं Vedanta के मालिक ऐसा

    वेदांता के चेयरपर्सन अनिल अग्रवाल का कहना है कि उनका सिर्फ एक ही लक्ष्य है, हिंदुस्तान जिंक के कारोबार को दोगुना करना। अगर सरकार अपनी हिस्सेदारी बेच देती है तो कंपनी बड़े फैसले ले सकेगी। अनिल अग्रवाल के मुताबिक सरकार ने मार्च में शेयरों की बिक्री की बात कही थी तो इसी का इंतजार किया जा रहा है। हालांकि उनका यह भी कहना है कि अगर सरकार मार्केट में अपने शेयरों की बिक्री नहीं करती है तो हिंदुस्तान जिंक का कारोबार सिकुड़ना शुरू हो जाएगा।

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    Hindustan Zinc के एक सौदे के खिलाफ है सरकार

    हिंदुस्तान जिंक ने वेदांता की विदेशों में मौजूद जिंक एसेट्स को खरीदना चाहती है। हालांकि सराकर इस सौदे का विरोध कर रही है। वेदांता ने 19 जनवरी को जानकारी दी थी कि इसके बोर्ड ने 298.1 करोड़ डॉलर में इस सौदे के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। वेदांता के पास ये एसेट्स अपनी पूरी हिस्सेदारी वाली सब्सिडियरी टीएचएल जिंक वेंचर्स लिमिटेड (म़ॉरीशस) के जरिए हैं। ये एसेट्स हिंदुस्तान जिंक की पूरी हिस्सेदारी वाली सब्सिडियरी को चरणबद्ध तरीके से सौंपने का प्रस्ताव है।

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    हालांकि सरकार ने इस सौदे का विरोध इस आधार पर किया कि यह माइनॉरिटी शेयरहोल्डर्स के खिलाफ है और कॉरपोरेट गवर्नेंस के नॉर्म्स का उल्लंघन करता है। इससे पहले सीएनबीसी-टीवी18 से बातचीत में हिंदुस्तान जिंक के सीईओ अरुण मिश्र ने कहा था कि सरकार एक महत्वपूर्ण स्टेकहोल्डर है और बोर्ड के फैसले में मेजॉरिटी-माइनॉरिटी शेयरहोल्डर्स की मंजूरी की जरूरत है। उन्होंने कहा था कि शेयरधारकों की बैठक बुलाने और मंजूरी हासिल करने के लिए तीन महीने हैं। अगर डील नहीं हो पाता है तो बोर्ड अगले कदम को लेकर फैसला लेगी।

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