दिग्गज निवेशक विजय केडिया ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से शेयर बाजार में लगने वाले लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन (LTCG) टैक्स को खत्म करने की मांग की है। उनका कहना है कि यह टैक्स उन निवेशकों को सजा देने जैसा है, जो लंबे समय तक कंपनियों में पैसा लगाकर देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में मदद करते हैं।
केडिया ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि लंबे समय तक शेयर होल्ड करने वाला निवेशक सट्टेबाज नहीं होता। वह कंपनियों को धैर्य वाली पूंजी देता है, जिससे कारोबार बढ़ता है, नौकरियां बनती हैं और देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होती है।
कंपनी की ग्रोथ पर पहले ही कई टैक्स
विजय केडिया का कहना है कि किसी कंपनी के बढ़ने के दौरान सरकार पहले ही कई तरह के टैक्स वसूलती है। इसमें कॉरपोरेट टैक्स, GST, कर्मचारियों का इनकम टैक्स, कस्टम ड्यूटी और स्टांप ड्यूटी जैसे टैक्स शामिल हैं।
उनके मुताबिक, जब सरकार हर स्तर पर टैक्स ले चुकी होती है, तो आखिर में LTCG टैक्स लगाना एक तरह से उसी कमाई पर दोबारा टैक्स लगाने जैसा है।
सोने से शेयर बाजार में पैसा लाने की जरूरत
केडिया ने कहा कि भारत को बड़ी कंपनियां और मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने के लिए लंबे समय की पूंजी चाहिए।
उनका मानना है कि सरकार की टैक्स नीति ऐसी होनी चाहिए, जिससे लोग सोने जैसी निष्क्रिय संपत्तियों में पैसा रखने की बजाय शेयर बाजार और कारोबार में निवेश करें। उन्होंने कहा कि सोना सिर्फ वैल्यू स्टोर करने का माध्यम है। वहीं, कंपनियों में निवेश रोजगार और संपत्ति दोनों पैदा करता है।
निवेश और सट्टेबाजी में फर्क होना चाहिए
विजय केडिया ने कहा कि सरकार को निवेश और सट्टेबाजी में साफ फर्क करना चाहिए। उनके मुताबिक, लंबे समय तक शेयर रखने वाला निवेशक सिर्फ खरीद-बिक्री नहीं करता, बल्कि देश की संपत्ति निर्माण प्रक्रिया का हिस्सा बनता है।
उन्होंने कहा कि सरकार को लंबे समय तक निवेश करने वालों को प्रोत्साहन देना चाहिए और उन्हें शॉर्ट टर्म ट्रेडर्स से अलग नजर से देखना चाहिए।
2018 में वापस आया था LTCG टैक्स
शेयर बाजार में लिस्टेड इक्विटी पर LTCG टैक्स को 14 साल बाद 2018 के बजट में दोबारा लागू किया गया था। इसके तहत 1 लाख रुपये से ज्यादा के लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन पर 10 प्रतिशत टैक्स लगाया गया।
बाद में बजट 2024 में इस टैक्स की दर बढ़ाकर 12.5 प्रतिशत कर दी गई और टैक्स छूट की सीमा 1.25 लाख रुपये कर दी गई।
LTCG टैक्स को लेकर निवेशकों और बाजार विशेषज्ञों के बीच लंबे समय से बहस चल रही है। लगभग हर बजट से पहले इसे कम करने या खत्म करने की मांग उठती रहती है।
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