सैटेलाइट-बेस्ड इंटरनेट सर्विसेज: DoT की नई कड़ी सिक्योरिटी गाइडलांइस, Starlink जैसे विदेशी ऑपरेटर्स को अब इन नियमों का करना होगा पालन
नए दिशानिर्देश विदेशी ऑपरेटर्स के लिए सिक्योरिटी रिक्वायरमेंट्स को लेकर अनिश्चितता को दूर करते हैं और कंप्लायंस के लिए एक क्लियर फ्रेमवर्क की पेशकश करते हैं। इंडियन टेरिटेरी में संचालित सभी डिवाइसेज के लिए अब यूजर टर्मिनल रजिस्ट्रेशन और रियल टाइम ऑथेंटिकेशन अनिवार्य है
नए निर्देशों को अब यूनिफाइड लाइसेंस एग्रीमेंट के चैप्टर XII में शामिल किया गया है।
दूरसंचार विभाग (DoT) ने सैटेलाइट-बेस्ड इंटरनेट सर्विसेज पर कंट्रोल को कड़ा करने के मकसद से कड़े सुरक्षा दिशा-निर्देशों का एक नया सेट जारी किया है। ये निर्देश ऐसे वक्त पर सामने आए हैं, जब स्टारलिंक और एमेजॉन की प्रोजेक्ट कुइपर जैसी ग्लोबल सैटेलाइट दिग्गज भारत में ऑपरेशंस के लिए GMPCS (ग्लोबल मोबाइल पर्सनल कम्युनिकेशंस बाय सैटेलाइट) लाइसेंस की मांग कर रही हैं।
नए निर्देशों को अब यूनिफाइड लाइसेंस (UL) एग्रीमेंट के चैप्टर XII में शामिल किया गया है। इनका उद्देश्य राष्ट्रीय सुरक्षा नियंत्रणों को सुदृढ़ करना है। दिशा-निर्देश GMPCS लाइसेंसहोल्डर्स, विशेष रूप से विदेशी ऑपरेटर्स के लिए ऑपरेशनल और डेटा कंप्लायंस को काफी हद तक कड़ा करते हैं।
क्या कहते हैं नए गाइडेंस
अपडेटेड फ्रेमवर्क के तहत, कंपनियों को अब भारतीय टेरिटेरी के अंदर हर प्रस्तावित गेटवे हब लोकेशन के लिए सिक्योरिटी क्लायरेंस हासिल करने होंगे। दिशा-निर्देश, मजबूत मॉनिटरिंग और वैध इंटरसेप्शन कैपेबिलिटीज को अनिवार्य करते हैं। इन्हें कमर्शियल ऑपरेशंस शुरू होने से पहले गेटवेज, पॉइंट ऑफ प्रेजेंस (PoPs), नेटवर्क कंट्रोल एंड मॉनिटरिंग सेंटर्स (NCMCs), या किसी भी समकक्ष इंफ्रास्ट्रक्चर में स्पष्ट रूप से फंक्शनल होना चाहिए।
दूरसंचार विभाग ने निर्धारित किया है कि मॉनिटरिंग सिस्टम्स, ट्रैफिक कंट्रोल पॉइंट्स और यूजर डेटा रूटिंग मैकेनिज्म्स सहित मुख्य नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर को पूरी तरह से भारत में ही रखा जाना चाहिए। ऑपरेटर्स के लिए इमरजेंसी के दौरान या नामित लॉ एनफोर्समेंट या सुरक्षा एजेंसियों के निर्देश पर खास यूजर्स के लिए या भौगोलिक क्षेत्रों में सर्विसेज को प्रतिबंधित करने या अस्वीकार करने की क्षमता का डेमो देना भी जरूरी है।
अतिरिक्त अनुपालन उपायों में पड़ोसी टेरिटेरीज, विशेष रूप से संवेदनशील और सीमावर्ती क्षेत्रों में सिग्नल ओवरस्पिल को रोकने के लिए सटीक जियो-फेंसिंग टेक्नोलॉजी शामिल है। सर्विस प्रोवाइडर्स को क्रॉस बॉर्डर इंटरफेरेंस से बचने और ऐसे क्षेत्रों में सर्विस लिमिटेशंस के सटीक इंप्लीमेंटेशन को सुनिश्चित करने के लिए अपने कवरेज फुटप्रिंट को तैयार करना चाहिए।
उच्च संवेदनशीलता वाले क्षेत्रों यानि हाई सेंसिटिविटी जोन्स, जैसे कि इंटरनेशनल लैंड बॉर्डर्स के 50 किलोमीटर के अंदर या 200 समुद्री मील तक फैले तटीय क्षेत्रों में, कंपनियों को नामित सुरक्षा एजेंसियों के लिए विशेष निगरानी क्षमताओं की सुविधा प्रदान करनी होगी। नए नियमों के तहत लाइसेंसहोल्डर्स के लिए भारत में पहले से प्रतिबंधित वेबसाइट्स तक एक्सेस को ब्लॉक करने और टेलिकॉम सिक्योरिटी ऑपरेशन सेंटर (TSOC) के लिए मेटाडेटा कलेक्शन को सक्षम करना भी जरूरी होगा।
इंडियन टेरिटेरी में संचालित डिवाइसेज के लिए यूजर टर्मिनल रजिस्ट्रेशन
इंडियन टेरिटेरी में संचालित सभी डिवाइसेज के लिए अब यूजर टर्मिनल रजिस्ट्रेशन और रियल टाइम ऑथेंटिकेशन अनिवार्य है। किसी भी अनरजिस्टर्ड या विदेशी डिवाइस को नेटवर्क तक एक्सेस की इजाजत देने से पहले उन्हें वेरिफिकेशन प्रोसेस से गुजरना होगा, यहां तक कि जियो-फेंस्ड जोन के अंदर भी। इसके अलावा ऑपरेटर्स से यह भी उम्मीद की जाएगी कि वे अनुरोध किए जाने पर संबंधित अधिकारियों को सटीक लैटिट्यूड और लॉन्गीट्यूट डिटेल्स सहित फिक्स्ड और मोबाइल टर्मिनल्स की रियल टाइम लोकेशन ट्रैकिंग उपलब्ध कराएंगे।
घरेलू नियंत्रण को और बढ़ाने के लिए, लाइसेंसहोल्डर्स को 2029 तक अपने यूजर टर्मिनल्स में भारत के NaviC सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम के लिए सपोर्ट को इंटीग्रेट करने के लिए प्रोत्साहित किया गया है। दिशा-निर्देश, देश के बाहर से भारतीय इंफ्रास्ट्रक्चर तक रिमोट ऑपरेशनल एक्सेस को भी प्रतिबंधित करते हैं। इसे केवल DoT की ओर से जारी किए गए रिमोट एक्सेस प्रोटोकॉल के सख्त अनुपालन के तहत इजाजत होगी।
डेटा सॉवरेनटी के मामले में नए दिशा-निर्देश स्पष्ट रूप से देश के बाहर इंडियन टेलिकॉम डेटा की कॉपी बनाने या डिक्रिप्शन को प्रतिबंधित करते हैं। सभी यूजर ट्रैफिक को भारतीय गेटवे के माध्यम से रूट किया जाना चाहिए। साथ ही भारतीय इंफ्रास्ट्रक्चर को बायपास करते हुए सैटेलाइट के जरिए यूजर टर्मिनल्स के बीच किसी भी प्रकार का डायरेक्ट कम्युनिकेशन स्पष्ट रूप से मना है।
इसके अलावा, सैटेलाइट ऑपरेशंस के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले डेटा सेंटर्स और DNS (डोमेन नेम सिस्टम) रिजॉल्यूशन सर्विसेज को भारत के अंदर स्थित होना चाहिए। लैंड-बेस्ड मोबिलिटी के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले मोबाइल टर्मिनल्स के लिए हर 2.6 किलोमीटर या हर मिनट, जो भी पहले हो, पर अपनी लोकेशन को रिपोर्ट करना जरूरी है। किसी यूजर टर्मिनल के वर्जित या प्रतिबंधित क्षेत्र में जाने पर उसकी सर्विसेज को सस्पेंड करने की क्षमता भी एक प्रमुख रिक्वायरमेंट है।