भुवन भास्कर
भुवन भास्कर
इन सबका नतीजा यह हुआ कि चीन की अर्थव्यवस्था अब भी पटरी पर लौटने की जद्दोजहद कर रही है। जहां भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), अमेरिकी फेड और कई यूरोपीय देशों ने ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर महंगाई पर काबू पाने की कोशिश शुरू कर दी है, चीन के सेंट्रल बैंक ने सबको चौंकाते हुए ब्याज दरों में कटौती की है क्योंकि चीन के लिए गिरती ग्रोथ रेट के नतीजे सिर्फ आर्थिक ही नहीं, राजनीतिक और सामाजिक रूप से भी घातक हो सकते हैं। यहां मामला सिर्फ ब्याज दर का नहीं है।
चीन एक गहरे आर्थिक संकट में उतर चुका है। राष्ट्रपति शि जिनपिंग की महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत दुनिया भर के कमजोर और जरूरतमंद देशों को अर्थव्यवस्था निर्माण के बहाने कर्ज के जाल में फंसाने की चीनी कोशिश अब पलट कर उसे ही फंसाने जा रही है। कोरोना काल में लगे झटके के कारण BRI योजना ज्यादातर देशों में ठप पड़ गई है और वे देश अब दिए गए कर्ज पर ब्याज लौटाने की हालत में भी नहीं हैं।
वर्जीनिया के विलियम एंड मैरी कॉलेज में एडडाटा के एग्जीक्युटिव डायरेक्टर डॉ. ब्रैड पार्क्स ने एक अध्ययन किया है यह जानने के लिए कि चीन ने वास्तव में BRI के तहत कितना कर्ज दिया है और इस कर्ज की प्रकृति क्या है?
डॉ. पार्क्स का अनुमान है कि चीन का BRI के तहत दिया गया ‘हिडेन डेट’ (छिपा हुआ कर्ज) 385 अरब डॉलर तक हो सकता है। और यह कर्ज किस कदर जोखिम के दायरे में है यह डॉ. पार्क्स के इस कथन से समझ में आता है कि इसे पाने वाले 42 लो-इनकम और मिडल-इनकम देश ऐसे हैं जिनकी चीन के प्रति देनदारी उनके अपने GDP के 10% से भी ज्यादा है।
इन्हें हिडेन डेट इसलिए कहा गया है कि इस कर्ज का 70% हिस्सा दिए गए देशों के बही-खाते में दर्ज तक नहीं किया गया है। ये कर्ज दर्ज हैं सरकारी कंपनियों, सरकारी बैंकों, स्पेशल पर्पज व्हीकल्स, ज्वाइंट वेंचर्स और निजी कंपनियों के खातों में। इनमें से ज्यादातर कर्ज की वापसी रुक गई है और इसलिए चीन के बैंक हलकान हैं।
सबप्राइम का संकट बढ़ा
नतीजा यह हुआ है कि बैंकों के पास जमाकर्ताओं के पैसे देने के लिए फंड नहीं है। जनता सड़कों पर उतर आई है। दूसरी तरफ चीन की GDP में 30% हिस्सेदारी रखने वाला रियल एस्टेट चरमरा रहा है। लगातार 11 महीनों से रियल एस्टेट की कीमतें गिर रही हैं, जिससे डेवलपरों का काम ठप हो गया है और घर खरीदारों ने अपने इंस्टॉलमेंट देने बंद कर दिए हैं। करीब 9 करोड़ घर बनकर तैयार हैं, लेकिन खरीदार नहीं है।
इन सब संकटों के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि चीन का यह संकट किस हद तक चीन को तोड़ सकता है। क्या चीन को दुनिया की एकछत्र आर्थिक और सैनिक शक्ति बनाने की शि जिनपिंग का स्वप्न अब स्वप्न ही रह जाएगा। या क्या चीन में पैदा होता जनाक्रोश और आर्थिक कमजोरी उसे USSR के रास्ते पर ले जाकर खड़ा कर देगी।
दरअसल कोरोना चीन के लिए जिस आर्थिक संकट का ट्रिगर प्वाइंट बना है, उसके लक्षण करीब एक दशक पहले से ही दिखने लगे थे। पिछले करीब एक दशक से चीन की आर्थिक वृद्धि दर दोहरे अंक को नहीं छू सकी है। लेकिन जब चीन अपने दोहरे अंकों की आर्थिक वृद्धि दर के आखिरी दौर में था, उसी समय 2012 में विश्व बैंक और पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (PRC) के स्टेट काउंसिल के डेवलपमेंट रिसर्च सेंटर ने एक संयुक्त अध्ययन किया, जिसमें चीन की समस्याओं और उसके समाधान पर की सिफारिशें की गईं।
इस अध्ययन में चीन के लिए जल्दी बुजुर्ग और वृद्ध होती जनसंख्या, कम होती श्रमिक संख्या, आर्थिक-सामाजिक और सांस्कृतिक तौर पर बढ़ती असमानता को मैनेज करना, सोशल सर्विस की डिलीवरी में अक्षमता इत्यादि को सबसे बड़ा जोखिम बताया। इस अध्ययन की खास बात यह थी कि इसे चीन सरकार की भी स्वीकृति हासिल थी।
लेकिन चीन की सरकार ने इस अध्ययन की सिफारिशों को ठंडे बस्ते में डाल दिया। इसके पीछे एक बड़ा कारण 2013 का सत्ता परिवर्तन था, जिसके जरिए शि जिनपिंग चीन के राष्ट्रपति बने। जिनपिंग की तीन महत्वाकांक्षाएं हैं: चीन के सबसे महान नेता के रूप में स्वयं को स्थापित करना, चीन को दुनिया की महाशक्ति के रूप में स्थापित करना और चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के शासन को स्थाई बनाना।
अपनी इन महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए जिनपिंग ने सैन्य सशक्तीकरण को अंधाधुंध खर्च किया और अपने सभी पड़ोसी देशों के प्रति आक्रामकता का प्रदर्शन करते हुए चीन को पूरी दुनिया में अलग-थलग कर दिया। कम्युनिस्ट विचारधारा को कठोरता से लागू करने के लिए जिनपिंग ने चीन की उस विरासत की जड़ों में ही मट्ठा डालना शुरू कर दिया, जिसके कारण चीन पूरी दुनिया में एक महान आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभर रहा था।
यह विरासत थी निजी क्षेत्र के उद्यमियों को प्रश्रय देना। लेकिन जिनपिंग ने धीरे-धीरे प्राइवेट सेक्टर को कमजोर करना शुरू कर दिया। आज दुनिया की कई बड़ी कंपनियां या तो चीन छोड़ चुकी हैं या छोड़ने की योजना बना रही हैं। जिनपिंग की इन नीतियों के कारण हर उस मोर्चे पर चीन की समस्या और बढ़ती गई, जिन्हें विश्व बैंक के साथ संयुक्त अध्ययन में चीन के लिए संभावित जोखिम बताया गया है।
ऐसे में सवाल यही है कि अब आगे क्या?
आगे चीन के लिए मुश्किलों का पहाड़ नजर आ रहा है। अपनी गलत जनसंख्या नीति के कारण चीन सभ्यता के इतिहास में सबसे तेज जनसांख्यिकीय गिरावट झेल रहा है। फ्रांस को जिस दौर में पहुंचने में 126 साल लगे, ब्रिटेन को 46 साल, जर्मनी को 40 साल और जापान को 24 साल लगे, चीन महज 21 सालों में उस मुकाम पर पहुंच चुका है।
चीन का समाज घटती जनसंख्या, वृद्धि होते लोग, तलाक की बढ़ती संख्या, कम शादियां, लैंगिक असंतुलन इत्यादि जैसी समस्याओं से जूझ रहा है, जिसका नतीजा श्रमिकों की संख्या में कमी, मजदूरी में वृद्धि, कम उत्पादकता, करदाताओं की संख्या में कमी और कंपनियों के मुनाफे में कमी के रूप में सामने आने लगा है। ये समस्याएं किसी भी आर्थिक संकट से बहुत गहरा और व्यापक है।
एक बार जब चीन का आर्थिक संकट बढ़ेगा, तो उसकी भारी-भरकम सेना बोझ बनने लगेगी। समाज का असंतुलन और बढ़ेगा और लोगों के बीच विरोध गहराएगा। हालांकि इस सबके बीच एक राजनीतिक खतरा यह है कि जनता को राष्ट्रवाद का भुलावा देने के लिए चीन की कम्युनिस्ट पार्टी पड़ोसी देशों के प्रति अपनी आक्रामकता और बढ़ा सकती है, जिससे भारत और ताईवान जैसे देशों के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं। लेकिन लंबी अवधि में इस तरह की चीन की कोई भी हरकत उसे और कमजोर ही करेगी।
(लेखक आर्थिक राजनीतिक मामलों के जानकार हैं)
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