बच्चे की स्कूल फीस से लेकर फॉरेन स्टडी तक का इंतजाम हो जाएगा, ऐसे बनाएं फाइनेंशियल प्लान
बच्चा जैसे-जैसे बढ़ता है उसकी जरूरतें बढ़ती जाती हैं। नए कपड़े खरीदने से क्लोदिंग पर खर्च बढ़ जाता है। जब वह स्कूल जाना शुरू करता है तो उसकी स्टडी पर खर्च शुरू हो जाता है। बच्चे के बड़े होने पर सबसे ज्यादा खर्च उसके एजुकेशन पर होता है
एक बच्चे को बड़ा करने पर आने वाले 36-38 लाख रुपये के कुल खर्च में एजुकेशन की हिस्सेदारी 74 फीसदी होती है। एजुकेशन का खर्च सालाना 10 फीसदी की दर से बढ़ रहा है।
एक बच्चे के जन्म से लेकर उसके 21 साल तक के होने पर माता-पिता के करीब 36-38 लाख रुपये खर्च होते हैं। एडुफंड रिसर्च से यह जानकारी मिली है। इसमें फूड, क्लोदिंग, गेजेट्स और एजुकेश पर आने वाले खर्च शामिल हैं। यह खर्च सालाना 7-10 फीसदी की दर से बढ़ रहा है।
शुरुआती सालों में बच्चे पर खास ध्यान देने की जरूरत होती है। इसलिए हेल्थकेयर और फूड पर आने वाले खर्च ज्यादा होता है।
बच्चा जैसे-जैसे बढ़ता है उसकी जरूरतें बढ़ती जाती हैं। नए कपड़े खरीदने से क्लोदिंग पर खर्च बढ़ जाता है। जब वह स्कूल जाना शुरू करता है तो उसकी स्टडी पर खर्च शुरू हो जाता है। बच्चे के बड़े होने पर सबसे ज्यादा खर्च उसके एजुकेशन पर होता है। इसमें ट्यूशन फीस, बुक्स, स्टेशनरी, कोचिंग आदि शामिल हैं।
यह खर्च तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन, लोगों के बीच इस बढ़ते खर्च को लेकर जागरूकता बहुत कम है। इस खर्च को पूरे करने के लिए जरूरी तैयारी के बारे में लोग बहुत कम जानते हैं। इसका एकमात्र रास्ता यह है कि हम ऐसे एसेट क्लास में इनवेस्ट करें, जिसकी ग्रोथ एजुकेशन इनफ्लेशन के मुकाबले ज्यादा हो। इस लक्ष्य को शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म गोल बनाकर हासिल किया जा सकता है।
शॉर्ट टर्म का मतलब ऐसे लक्ष्य से है, जिसे एक साल से कम समय में हासिल किया जा सकता है। इसमें बच्चे की स्कूल और ट्यूशन फीस शामिल हो सकती है।
लॉन्ग टर्म के तहत ऐसे गोल आते हैं, जिसमें आपके पास बहुत समय होता है। आपके पास फंड जुटाने के लिए कई साल का समय होता है। इसमें आपके बच्चे की कॉलेज फीस या एजुकेशन से जुड़े दूसरे खर्च शामिल हो सकते हैं। ये बच्चे की उम्र बढ़ने पर सामने आते है।
बच्चा जब स्कूल जाना शुरू करता है तो स्कूल फीस के अलावा दूसरे तरह के खर्च भी होते हैं। जैसे लैपटॉप का खर्च। ये सभी खर्च जरूरी होते हैं जिन्हें तुरंत पूरा करना पड़ता है। अक्सर इनकी अनदेखी होती है। लेकिन, अगर हम ठीक तरह से प्लानिंग करें तो इन्हें हम आसानी से पूरे कर सकते हैं।
मान लीजिए कि आप अपने बच्चे की स्कूल फीस के लिए बचत करने का प्लान बनाते हैं। यह शॉर्ट टर्म गोल है, जिसे आप एक साल में जुटा लेते हैं। इसकी जरूरत अगले एकैडमिक ईयर से पड़ेगी। मान लीजिए आप बच्चे की स्कूल फीस के लिए 1.25 लाख रुपये की सेविंग करते हैं। इसके लिए आपके पास एक साल का समय है। इस टारगेट को पूरा करने के लिए आपको सही इनवेस्टमेंट व्हीकल में इनवेस्ट करना जरूरी है।
इस टारगेट को पूरा करने के लिए ऐसे म्यूचुअल फंड में निवेश करना होगा, जिसमें सेफ्टी के साथ अच्छी लिक्विडिटी हो। साथ ही निवेश की ग्रोथ की भी अच्छी संभावना हो। डेट फंड इसके लिए सबसे अच्छे ऑप्शन हैं, क्योंकि इसमें उतार-चढ़ाव कम होता है। आप एक साल के लिए हर महीने 10,000 रुपये की SIP शुरू कर सकते हैं। इससे आप एक साल में 1.2 लाख रुपये इनवेस्ट करेंगे और मैच्योरिटी पर आपको 1.25 लाख रुपये मिलेंगे।
हायर एजुकेशन का टारगेट
हायर एजुकेशन पर ज्यादा खर्च आता है। फीस के अलावा आपको अकोमोडेशन, यूटिलिटी बिल, क्लॉथ, बुक्स, ग्रॉसरी, ट्रांसपोर्ट आदि पर खर्च करना पड़ता है। कुल खर्च में फीस की हिस्सेदारी सिर्फ 40 फीसदी होती है।
एक बच्चे को बड़ा करने पर आने वाले 36-38 लाख रुपये के कुल खर्च में एजुकेशन की हिस्सेदारी 74 फीसदी होती है। एजुकेशन का खर्च सालाना 10 फीसदी की दर से बढ़ रहा है।
मान लीजिए आपको 15 साल बाद बच्चे के एजुकेशन के लिए 1 करोड़ रुपये चाहिए। इस टारगेट को हासिल करने के लिए आपको हर महीने 15,000 रुपये का एक SIP शुरू करना होगा। अगर यह सालाना 15 फीसदी की दर से बढ़ता है तो आप आसानी से जरूरी फंड को जुटा सकेंगे।
आपको इनवेस्टमेंट की शुरुआत जितनी जल्द हो उतनी शुरू कर देना चाहिए। इससे आपको अच्छा फंड तैयार करने में कंपाउंडिंग बेनेफिट का बहुत फायदा मिलेगा। हायर एजुकेशन खर्च को पूरा करने के लिए हाई रिस्क फंड में निवेश शुरू करना ठीक रहेगा। फिर, लक्ष्य नजदीक आने पर आप अपना पैसा कैपिटल प्रोटेक्शन फंड में ट्रांसफर कर सकते हैं।
लॉन्गट टर्म टारगेट के लिए इनवेस्टमेंट के स्टेज
1. एक्युमुलेशन फेज: इस स्टेज पर इनवेस्टर के रिस्क लेने की क्षमता ज्यादा होती है। इसमें कैपिटल की ग्रोथ की रफ्तार तेज रहती है। इसमें आपके निवेश की वैल्यू में उतार-चढ़ाव होता है। लेकन, प्रॉफिट भी अच्छा होता है। यहां 'हायर रिवॉर्ड, हायर रिस्क' की थ्योरी काम करती है।
2. कैपिटल प्रोटेक्शन फेज: इस फेज में कैपिटल को एग्रेसिव एलोकेशन से बैलेंस्ड फंड/कंजरवेटिव हायब्रिड या डेट फंड में ट्रांसफर करना सुरक्षित रहता है।
इनफ्लेशन के असर को कम करने के साथ ही प्रॉफिट और लिक्विडिट बनाए रखना आपका लक्ष्य होना चाहिए।
इसलिए सबसे पहले आपको शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म गोल को तय करना पड़ेगा। इसके लिए जितनी जल्द हो सके निवेश शुरू कर देना होगा। दोनों तरह के गोल में इनवेस्टमेंट की स्ट्रेटेजी अलग-अलग होगी। इससे बच्चे की शिक्षा के लिए पैसे का पर्याप्त आसानी से हो जाएगा।