डिजिटल एसेट्स को सुरक्षित रखना उतना ही जरूरी है जितना कैश को सुरक्षित रखना। लेकिन, डिजिटल एसेट्स को स्पेशियलाइज्ड वॉलेट्स पर स्टोर करने के लिए साइनिंग प्रोसेस जरूरी होता है। इसमें प्राइवेट की का इस्तेमाल होता है। इससे मामला थोड़ा जटिल हो जाता है। प्राइवेट की का मतलब लंबे अल्फान्यूमेरिक कोड से है, जो पासवर्ड का काम करता है। यह क्रिप्टो ट्रांजेक्शन के लिए अथॉराइज करता है। प्राइवेट की को डिजिटल डिवाइस या क्लाउड पर रखना आसान नहीं है। इसके लिए कुछ सेफगार्ड्स और प्रोटोकॉल की जरूरत पड़ती है।
कस्टडी प्रोवाइडर्स डिजिटल एसेट्स को स्टोर करने में मदद करते हैं
स्टोरेज में डिजिटल एसेट्स (Digital Assets) का अमाउंट बढ़ने पर जटिलता कई गुना बढ़ जाती है। यही वजह है कि कई बड़े कस्टडी प्रोवाइडर्स मार्केट्स में आ गए हैं, जो इनवेस्टर्स को प्राइवेट की (Private Key) सुरक्षित रखने में मदद करते हैं। अगर दूसरे यूजर्स को प्राइवेट की के इस्तेमाल के लिए अथॉराइज करना है तो इसका प्रोसेस बहुत जटिल है। इसमें कानूनी प्रक्रिया भी शामिल है। दूसरा बड़ा चैलेंज सक्सेशन प्लानिंग है।
ट्रेडिशनल एस्टेट प्लानिंग में डिजिटल एसेट्स पर ध्यान नहीं
डिजिटल एसेट्स के कई फॉर्म हैं। इनमें क्रिप्टोकरेंसीज, नॉन-फंजिबल टोकेंस (NFT), टोकेनाइज्ड सिक्योरिटीज, स्टॉक्स जैसे रियल वर्ल्ड एसेट्स, सोशल मीडिया अकाउंट्स और डिजिटल कंटेंट शामिल हैं। ट्रेडिशनल एस्टेट प्लानिंग में इन एसेट्स को नजरअंदाज कर दिया जाता है। इससे उत्तराधिकारी के लिए इन पर अपना अधिकार साबित करना बहुत मुश्किल हो जाता है।
रेगुलेटेड कस्टोडियंस मालिकाना हक ट्रांसफर करने में मदद करते हैं
रेगुलेटेड कस्टोडियंस डिजिटल एसेट्स का मालिकाना हक व्यक्ति के उत्तराधिकारी को ट्रांसफर करने में मदद करते हैं। रेगुलेटेड कस्टोडियंस ओनरशिप का पूरा रिकॉर्ड रखते हैं। वे डिजिटल एसेट्स के मालिक को यह भी बताते हैं कि वे किस तरह डिजिटल एसेट्स को अपने इनहेरिटेंस प्लानिंग में शामिल कर सकते हैं। इससे इनहेरिटेंस यानी डिजिटल एसेट्स का मालिकाना हक उत्तराधिकारी को ट्रांसफर होने में किसी तरह का कानूनी मसला नहीं रह जाता है।
वेल्थ मैनेजमेंट में डिजिटल एसेट्स को शामिल करना जरूरी
रेगुलेटेड कस्टोडियंस वेल्थ मैंजमेंट प्लान में ट्रेडिशनल एसेट्स के साथ डिजिटल एसेट्स को इंटिग्रेट कर सकते हैं। डिजिटल एसेट्स उत्तराधिकारी को ट्रांसफर करने में टैक्स का मसला शामिल होता है। डिजिटल एसेट्स को लेकर लगातार नए रेगुलेशंस आ रहे हैं। कस्टोडियंस उन रेगुलेशंस को ठीक तरह से समझता है और खुद को अपडेट रखता है।
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डिजिटल एसेट्स के सक्सेशन से जुड़े कानून एक जैसे नहीं
डिजिटल एसेट्स के सक्सेशन (उत्तराधिकारी को ट्रांसफर) से जुड़े कानून अलग-अलग देश में अलग-अलग हैं। उदाहरण के लिए इंडिया में डिजिटल एसेट्स के इनहेरिटेंस के लिए अलग से कोई कानून नहीं है। इसकी बड़ी वजह यह है कि क्रिप्टो और दूसरे डिजिटल एसेट्स के लिए रेगुलेशन नहीं है। इससे इन एसेट्स के इनहेरिटेंस में काफी दिक्कत आती है। इनहेरिटेंस के ट्रेडिशनल कानून इस पर लागू नहीं होते हैं।