क्या आप अपने क्रेडिट कार्ड के बिल को पूरा चुकाने की जगह कैरी-फॉरवर्ड करते हैं, आप छोटी-बड़ी चीजों को खरीदने के लिए पर्सनल लोन (Personal Loan) लेते हैं? आप ई-कॉमर्स कंपनियों की साइट पर उपलब्ध 'बाय नाउ पे लेटर' (BNPL) फैसिलिटी का इस्तेमाल करते हैं? अगर इन सवालों के जवाब हां है तो आपको कर्ज लेने की अपनी आदत के बारे में एक बार सोचने की जरूरत है। दरअसल, इडिया में लोगों खासकर युवाओं की लाइफस्टाइल तेजी से बदल रही है। वे इसके लिए खुलकर कर्ज ले रहे हैं। RBI के डेटा से इसकी पुष्टि होती है।
क्या बताता है RBI का डेटा?
RBI के मुताबिक, सितंबर 2018 में लोगों ने कुल 19.55 लाख करोड़ रुपये का पर्सनल लोन लिया था। यह सितंबर 2022 में बढ़कर 35.98 लाख करोड़ रुपये हो गया। यह सिर्फ 4 साल में 84% ग्रोथ है। FREED के सीईओ रितेश श्रीवास्तव का कहना है कि यह आंकड़े परेशान करने वाले हैं। मनीकंट्रोल से बातचीत में उन्होंने इस समस्या के कई पहलुओं के बारे में बताया।
लोगों को कर्ज के जाल में फंसने का पता नहीं होता
श्रीवास्तव ने कहा कि कुल पर्सनल लोन में क्रेडिट कार्ड पर लिया गया लोन शामिल है। यह सबसे खतरनाक किस्म का लोन है। अक्सर लोग इसके कर्ज के जाल में फंस जाते हैं। फिर इससे बाहर निकलना उनके लिए मुश्किल हो जाता है। खबसे गंभीर बात यह है कि उन्हें पता नहीं होता कि वे कर्ज के जाल में फंस चुके हैं। उन्हें समस्या की गंभीरता के बारे में काफी देर से पता चलता है। उन्होंने कहा कि हमारी कंपनी FREED ऐसे लोगों की मदद करती है। इसकी शुरुआत अगस्त 2020 में हुई थी। यह बैंक और एनबीएफसी से मिलकर व्यक्ति को कर्ज के जाल से बाहर निकलने का प्लान तैयार करती है।
कर्ज लेने को इंडिया में अच्छा नहीं माना जाता
उन्होंने कहा कि आजकल कई लोग और परिवार मोबाइल फोन जैसी चीजें खरीदने के लिए भी कर्ज ले रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक, इंडिया में परिवारों पर कर्ज का बोझ 1 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया है। इसका 16 फीसदी हिस्सा अनसेक्योर्ड कर्ज है। इसका मतलब है कि यह क्रेडिट कार्ड कर्ज या पर्सनल लोन है। इसका करीब 10 फीसदी डिफॉल्ट हो जाता है। यह काफी ज्यादा है। क्रेडिट कार्ड और BNPL जैसी स्कीमों के बढ़ते इस्तेमाल से लोगों के कर्ज लेने की आदत बढ़ रही है। हालांकि, इंडिया में कर्ज लेने के चलन को अच्छा नहीं माना जाता है। कर्ज वसूलने वाले लोगों के किसी घर का दरवाजा खटखटाने को खराब माना जाता है। इसके बावजूद कर्ज लेने की आदत बढ़ रही है।
श्रीवास्तव ने कहा कि FREED का मकसद व्यक्ति को कर्ज के जाल से सिर्फ बाहर निकालना नहीं है। जब तक पूरा कर्ज चुका नहीं दिया जाता या वह पूरी तरह कर्जमुक्त नहीं हो जाता, हम उसकी मदद करते हैं। हम बॉरोअर के रूप में उसे उसके अधिकारों के बारे में बताते हैं। हम उसे यह भी बताते हैं कि कर्ज देने वाला बैंक या NBFC कर्ज नहीं लौटाने पर क्या कर सकता है।
यह पूछने पर आखिर FREED किस तरह ग्राहक की मदद करती है, श्रीवास्तव ने कहा कि FREED का काम क्रेडिट काउंसेलिंग है। इसमें हम लोगों को अपने संसाधनों का इस्तेमाल कर कर्ज चुकाने में मदद करते हैं। हम बैंक से बातचीत में उनकी मदद करते हैं। लेकिन, उनके पास संसाधन होना जरूरी है। उनके पास कर्ज चुकाने के लिए इनकम होनी जरूरी है। उन्हें यह काम कैसे करना है, हमारी सलाह इस बारे में होती है।
बैंक और एनबीएफसी को भी वापस मिल जाता है ज्यादा पैसा
FREED के काम करने के तरीके के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि जब बैंक किसी ग्राहक (Borrower) को NPA की कैटेगरी में डाल देता है तो यह मामला कलेक्शन एजेंसी के पास चला जाता है। ग्राहक कलेक्शन एजेंसी से बचने की कोशिश करता है। उसके बाद चूहे-बिल्ली का खेल शुरू होता है। कई बार ग्राहक को बहुत प्रताड़ित किया जाता है। 7-8 महीनों के बाद कलेक्शन एजेंसी ज्यादा से ज्यादा 20 फीसदी पैसा वसूल पाती है। हमारे सेटसमेंट ऑफर में यह 40 से 50 फीसदी तक होता है। इसलिए बैंक भी हमारे साथ काम कर खुश होते हैं। हमारे पास अपने काम का ट्रैक रिकॉर्ड है।