TDS यानी टैक्स डिडक्टेड एट सोर्स और TCS यानी टैक्स कलेक्टेड एट सोर्स को अक्सर लोग सिर्फ टैक्स नियम मानते हैं। लेकिन अब इनका असर सिर्फ टैक्स भरने तक सीमित नहीं रहा। ये नियम धीरे-धीरे लोगों के खर्च करने, निवेश करने और रिकॉर्ड रखने के तरीके को बदल रहे हैं।
प्रॉपर्टी खरीद में TDS क्यों जरूरी
अगर आप 50 लाख रुपये या उससे ज्यादा की प्रॉपर्टी खरीदते हैं, तो आपको 1% TDS काटना जरूरी होता है। यह पैसा सरकार के पास जमा करना होता है। इससे बड़े लेन-देन पर नजर रखना आसान होता है। अब नियम और सख्त हो गए हैं। TDS अब डील वैल्यू या स्टांप ड्यूटी वैल्यू, जो ज्यादा हो उस पर लगाया जाता है। इससे गलत कीमत दिखाने की गुंजाइश कम हो गई है।
TCS को लेकर अभी भी कन्फ्यूजन
रियल एस्टेट में TCS के नियम उतने साफ नहीं हैं। खासकर जब प्रोजेक्ट में अलग-अलग सर्विस जुड़ी होती हैं, तो यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि TCS लगेगा या नहीं। इसलिए बिल्डर्स और डेवलपर्स को हर डील को ध्यान से समझना पड़ता है। इससे खरीदार और विक्रेता दोनों की जिम्मेदारी बढ़ गई है।
अब खरीदार को यह ध्यान रखना होता है कि TDS सही समय पर जमा हो। वहीं विक्रेता को यह देखना होता है कि उसका पैसा Form 26AS में सही दिख रहा है या नहीं। छोटी गलती भी परेशानी खड़ी कर सकती है, जैसे पेनल्टी या देरी।
अब लोग ज्यादा प्लानिंग से खर्च कर रहे
TCS खासकर विदेश में खर्च और बड़े लेन-देन पर लगाया जाता है। इससे हर ट्रांजैक्शन रिकॉर्ड में आता है। इसका असर यह हुआ है कि लोग अब खर्च करने से पहले सोचते हैं। कितना खर्च करना है, कब करना है और क्यों करना है।
ई-कॉमर्स और ऑनलाइन सेलर्स पर भी इसका असर दिख रहा है। TCS पूरे सेल वैल्यू पर लगता है, जिससे उनका कैश फ्लो प्रभावित होता है।