Gold vs Oil: 27 फरवरी को यानी पश्चिम एशिया में संघर्ष शुरू होने से एक दिन पहले सोना 5,278 डॉलर पर ट्रेड कर रहा था। वह करीब एक महीने बाद 4,531 डॉलर पर आ गया। यानी करीब 14% की गिरावट। इसमें से ज्यादातर गिरावट पिछले दो हफ्तों में आई है।

Gold vs Oil: 27 फरवरी को यानी पश्चिम एशिया में संघर्ष शुरू होने से एक दिन पहले सोना 5,278 डॉलर पर ट्रेड कर रहा था। वह करीब एक महीने बाद 4,531 डॉलर पर आ गया। यानी करीब 14% की गिरावट। इसमें से ज्यादातर गिरावट पिछले दो हफ्तों में आई है।
हैरानी की बात ये है कि संघर्ष अभी भी खत्म होने का नाम नहीं ले रहा, फिर भी सोना गिर रहा है। सवाल सीधा है, जब दुनिया में तनाव बढ़ रहा है, तो सुरक्षित माने जाने वाला सोना कमजोर क्यों पड़ गया?
निवेशक सोना क्यों खरीदते हैं?
इसे जानने के लिए पहले ये समझना जरूरी है कि लोग सोना खरीदते ही क्यों हैं। अगर आसान शब्दों में कहें तो, जब दुनिया में अनिश्चितता बढ़ती है, लोग अपने पैसे को सुरक्षित रखने के लिए सोने की तरफ भागते हैं।
जब संकट का डर बढ़ता है, तो सोने की कीमत भी चढ़ती है। फरवरी की शुरुआत में सोना 4,622 डॉलर पर था, जो संघर्ष शुरू होने से पहले एक महीने में करीब 13% बढ़ गया। यानी डर बढ़ा, तो सोना भी चढ़ा।
असली संकट आते ही क्या बदला?
अब यहां असली खेल शुरू होता है। जब संकट सिर्फ डर नहीं रहता, बल्कि हकीकत बन जाता है, तो उसका असर अलग तरीके से दिखता है। युद्ध में सबसे पहला असर उन देशों पर पड़ता है जो सीधे इसमें शामिल होते हैं- जहां जान-माल का नुकसान होता है और इंफ्रास्ट्रक्चर टूटता है। लेकिन इससे भी बड़ा असर होता है अर्थव्यवस्था पर, जो धीरे-धीरे पूरी दुनिया में फैलता है।
इस केस में असली झटका तेल और गैस की सप्लाई पर पड़ा है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के लिए बहुत अहम रास्ता है, जहां से बड़ी मात्रा में तेल गुजरता है। इसी वजह से पिछले एक महीने में ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत करीब 40% बढ़ गई।
तेल महंगा हुआ, तो सोना क्यों गिरा?
अब तेल और सोने का सीधा कनेक्शन समझिए। तेल एक जरूरी चीज है, इसे हर हाल में खरीदना ही पड़ता है। जब तेल महंगा होता है, तो जिन देशों को तेल बाहर से मंगाना पड़ता है, उनका खर्च अचानक बढ़ जाता है।
ऐसे में सबसे पहले लोग अपनी खपत कम करते हैं, लेकिन उससे पूरा फर्क नहीं पड़ता। तेल का बिल फिर भी ज्यादा आता है। अब उस बिल को चुकाने के लिए ज्यादा डॉलर चाहिए होते हैं। और यहां सोना काम आता है- देश सोना बेचते हैं, डॉलर लेते हैं, और उससे तेल खरीदते हैं। कई देश ऐसा करने भी लगे हैं।
यानी जिस सोने को लोग संकट के डर में खरीदते हैं, उसी सोने को संकट आने पर बेचकर काम चलाते हैं। यही वजह है कि सोने की कीमत गिर रही है। जब तक तेल की कीमतें स्थिर नहीं होंगी, तब तक सोने में फिर से तेजी आना मुश्किल है।
सिर्फ सोना नहीं, बाकी बाजार भी दबाव में
ये गिरावट सिर्फ सोने तक सीमित नहीं है। शेयर बाजार और बॉन्ड्स भी नीचे आ रहे हैं। दरअसल, अभी सिर्फ वही चीजें महंगी हो रही हैं जिनकी सप्लाई कम है। जैसे कि तेल और दूसरी जरूरी कमोडिटी।
बाकी फाइनेंशियल एसेट्स भी सोने की तरह ही काम करते हैं। जरूरत पड़ने पर उन्हें बेचा जाता है, ताकि बढ़ते खर्च को संभाला जा सके। इसलिए हर तरफ दबाव दिख रहा है।
अगर संकट लंबा चला तो क्या होगा?
अगर यह संघर्ष लंबा खिंचता है, तो एसेट्स की कीमतों में और गिरावट आ सकती है। वजह साफ है, जब अर्थव्यवस्था कमजोर होती है, तो लोगों के पास बचत और निवेश के लिए पैसा कम बचता है। जब निवेश कम होता है, तो कीमतें भी नीचे आती हैं।
अगर हालात ज्यादा बिगड़े, तो यह मंदी का रूप भी ले सकता है। ऐसे में नौकरियों पर असर पड़ सकता है और आमदनी घट सकती है।
निवेशकों के लिए रास्ता क्या है?
अब सवाल ये है कि ऐसे माहौल में निवेशक क्या करें। जिनके पास पर्याप्त पैसा और धैर्य है, उनके लिए यह समय खरीदारी का मौका हो सकता है। बाजार में एक पुराना नियम है... जब सब डर रहे हों, तब खरीदो। क्योंकि हर संकट एक दिन खत्म होता है, और जो लोग उस समय निवेश करते हैं, उन्हें बाद में फायदा मिलता है।
लेकिन इसमें जोखिम भी कम नहीं है। हो सकता है कि सोना और बाकी बाजार अभी और नीचे जाएं, उसके बाद ही रिकवरी आए। छोटे निवेशकों और आम परिवारों के लिए यह समय थोड़ा मुश्किल हो सकता है- महंगाई बढ़ेगी, लेकिन आय उतनी तेजी से नहीं बढ़ेगी।
अगर आपको लगता है कि आने वाले समय में आपकी आमदनी पर असर पड़ सकता है, तो ज्यादा जोखिम लेने की बजाय सुरक्षित विकल्पों में बने रहना समझदारी होगी।
Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।
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