Gold-Silver Prices: सोना-चांदी में बड़ी गिरावट; एक्सपर्ट बोले- अब ये नहीं रहे सुरक्षित निवेश
अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना $4500 और चांदी $70 के नीचे फिसल गई है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि गोल्ड और सिल्वर अब पारंपरिक सुरक्षित निवेश नहीं रहे। हालांकि शॉर्ट टर्म में तेजी आ सकती है, लेकिन आगे बड़ी गिरावट का खतरा भी बताया गया है।
सोने की कीमत एक बार फिर $4,500 प्रति औंस के अहम स्तर से नीचे आ गई।
ईरान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के युद्धविराम प्रस्ताव को ठुकरा दिया है। उसने अमेरिका के सामने 5 कड़ी शर्तें रखी हैं और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज जैसे अहम समुद्री मार्ग पर अपने संप्रभु नियंत्रण की बात दोहराई है। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने और चांदी में गिरावट देखने को मिली।
सोने की कीमत एक बार फिर $4,500 प्रति औंस के अहम स्तर से नीचे आ गई। इंट्राडे में $4,413 प्रति औंस तक गिर गई। वहीं चांदी में भी बिकवाली बढ़ी। इसकी कीमत $70 प्रति औंस के स्तर से नीचे फिसलकर करीब $67 प्रति औंस तक पहुंच गई।
वहीं, रामनवमी के अवसर पर बाजार बंद रहने के कारण MCX पर घरेलू बुलियन वायदा भाव शाम 5 बजे खुला। शाम 5:24 बजे तक सोने का वायदा भाव पिछले बंद भाव से 2.43 प्रतिशत गिरकर 1,40,830 रुपये पर रहा। चांदी का भाव 5.88 प्रतिशत गिरकर 2,24,605 रुपये प्रति किलोग्राम पर आ गया।
कच्चे तेल की तेजी से बढ़ी चिंता
इस बीच ग्लोबल ऑयल मार्केट में भी फिर तेजी देखने को मिली है। अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड एक दिन की नरमी के बाद फिर से $100 प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया है। वहीं अमेरिकी बेंचमार्क WTI भी बढ़कर करीब $93 प्रति बैरल तक पहुंच गया है।
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण ऊर्जा बाजार में सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ गई है। तेल की कीमतें बढ़ने से महंगाई की चिंता भी बढ़ जाती है। इसका असर सोने-चांदी जैसी कीमती धातुओं पर भी पड़ता है।
ब्याज दरों को लेकर बदला नजरिया
बाजार में अब यह धारणा मजबूत हो गई है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व इस साल ब्याज दरों में कटौती नहीं करेगा। जबकि कुछ महीने पहले तक बाजार को कम से कम दो बार दरों में कटौती की उम्मीद थी।
ऊंची ब्याज दरों का असर यह होता है कि सोने जैसे एसेट, जिन पर ब्याज नहीं मिलता, उनमें निवेश का आकर्षण थोड़ा कम हो जाता है। इसी वजह से सोने की कीमतों पर फिलहाल दबाव बना हुआ है।
डॉलर मजबूत, सोने पर दबाव
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक- अमेरिका खाड़ी क्षेत्र में हजारों सैनिक तैनात करने की तैयारी कर रहा है। इससे ईरान के साथ तनाव और बढ़ने की आशंका है। ऐसे माहौल में निवेशक सुरक्षित निवेश की तरफ जाते हैं और अमेरिकी डॉलर को प्राथमिकता मिलती है। इसी वजह से डॉलर इंडेक्स फिर से मंथली हाई लेवल के आसपास पहुंच गया है।
मजबूत डॉलर का असर यह होता है कि दूसरी मुद्राओं वाले निवेशकों के लिए सोना और चांदी महंगे हो जाते हैं। इससे इनकी मांग पर असर पड़ सकता है।
घरेलू बाजार पर भी पड़ेगा असर
एक्सपर्ट्स के अनुसार बुधवार को सोना और चांदी में जो तेजी आई थी, वह ज्यादा तर राहत भरी खरीदारी और शॉर्ट कवरिंग की वजह से थी। घरेलू बाजार में MCX इन वैश्विक संकेतों पर शाम के सत्र में प्रतिक्रिया दे सकता है। क्योंकि राम नवमी के कारण दिन में एक्सचेंज आंशिक रूप से बंद रहा।
LKP Securities के रिसर्च एनालिस्ट जतीन त्रिवेदी के मुताबिक जब तक भू-राजनीतिक तनाव और महंगाई को लेकर चिंता बनी रहती है, तब तक सोने की कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है। उनके मुताबिक- शॉर्ट टर्म में सोने का दायरा ₹1,35,000 से ₹1,55,000 प्रति 10 ग्राम के बीच रह सकता है।
अब सुरक्षित निवेश नहीं रहा सोना?
PACE 360 के को-फाउंडर और चीफ ग्लोबल स्ट्रैटेजिस्ट अमित गोयल का मानना है कि सोना और चांदी अब पारंपरिक सुरक्षित निवेश नहीं रहे। उनके मुताबिक- दोनों धातुएं अब धीरे धीरे रिस्क एसेट की तरह व्यवहार करने लगी हैं। इससे आगे चलकर इनमें बबल बनने और फिर तेज गिरावट आने का खतरा है।
गोयल लंबी अवधि के नजरिए से सतर्क हैं, लेकिन निकट अवधि में उन्होंने दोनों धातुओं पर तेजी का रुख अपनाया है। उनके मुताबिक उनकी फर्म ने हाल ही में एक से दो महीने के नजरिए से सोना और चांदी में आक्रामक खरीदारी की है।
शॉर्ट टर्म में उछलेंगे सोना-चांदी
गोयल का अनुमान है कि अगर वेस्ट एशिया में भू-राजनीतिक तनाव कम होता है, तो महंगाई और बॉन्ड यील्ड का दबाव भी घट सकता है। ऐसे माहौल में जोखिम वाले एसेट्स के साथ सोना और चांदी में भी तेजी देखने को मिल सकती है।
गोयल के मुताबिक इस दौरान सोना करीब $4,400 से बढ़कर $5,000 प्रति औंस तक जा सकता है। वहीं, चांदी $69.5 से बढ़कर $85-86 प्रति औंस तक पहुंच सकती है।
हालांकि वह मानते हैं कि यह तेजी स्थायी नहीं होगी। गोयल के अनुसार अगले 12-18 महीनों में सोना और चांदी में बड़ी गिरावट देखने को मिल सकती है। क्योंकि उन्हें आने वाले समय में अमेरिका में मंदी और वैश्विक स्तर पर डिफ्लेशन का खतरा दिखाई दे रहा है।
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