1970 का गोल्ड बूम: एक दशक में 24 गुना बढ़ा था सोना, फिर आई थी बड़ी गिरावट... जानिए पूरी कहानी
1970 का दशक गोल्ड के इतिहास का सबसे बड़ा बुल रन माना जाता है। इस दौर में सोना 35 डॉलर से बढ़कर 850 डॉलर तक पहुंच गया था। हालांकि इसके बाद इसमें बड़ी गिरावट आई और कीमत कई साल तक दबाव में बनी रही। जानिए पूरी कहानी।
जनवरी 1980 में गोल्ड लगभग 850 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच गया था।
पिछले कुछ साल में सोने में जबरदस्त उछाल दिखा। 2023 में करीब ₹63 हजार से यह 2026 में ₹1.8 लाख प्रति 10 ग्राम तक पहुंच गया। यानी करीब तीन गुना तेजी। हालांकि, ईरान युद्ध शुरू होने के बाद इसका दाम अपने पीक से करीब 20% तक गिर चुका है। जबकि अमूमन युद्ध जैसे दौर में इसका दाम तेजी से बढ़ता है।
हालांकि, ऐसा पहले भी हो चुका है। 1970 का दशक गोल्ड के इतिहास का सबसे नाटकीय दौर माना जाता है। इसी दशक में सोने ने ऐसी तेजी देखी, जिसने निवेश की पूरी दुनिया को बदल दिया। लेकिन यह कहानी सिर्फ तेजी की नहीं है, इसमें उतार चढ़ाव के कई बड़े मोड़ भी थे।
करीब एक दशक में सोना 35 डॉलर से 850 डॉलर तक पहुंचा, लेकिन इसके बाद इसकी कीमत कई साल तक दबाव में रही। आइए जानते हैं सोने में रिकॉर्ड तोड़ उतार-चढ़ाव की ये पूरी कहानी।
गोल्ड स्टैंडर्ड से बदला खेल
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया की मुद्रा व्यवस्था Bretton Woods System पर आधारित थी। इसके तहत अमेरिकी डॉलर को सीधे सोने से जोड़ा गया था और 1 औंस गोल्ड की कीमत 35 डॉलर तय थी।
लेकिन 15 अगस्त 1971 को अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन (Richard Nixon) ने घोषणा कर दी कि अब डॉलर को सोने में बदला नहीं जाएगा। इस फैसले को Nixon Shock कहा गया। इसके बाद Bretton Woods सिस्टम प्रभावी रूप से खत्म हो गया और पहली बार सोने की कीमत पूरी तरह बाजार की ताकतों से तय होने लगी। यहीं से गोल्ड के असली बुल रन की शुरुआत हुई।
35 डॉलर से 850 डॉलर तक का विस्फोट
1970 की शुरुआत में गोल्ड करीब 35 डॉलर प्रति औंस के आसपास था। जैसे ही गोल्ड स्टैंडर्ड खत्म हुआ, निवेशकों ने सोने को सुरक्षित निवेश के रूप में खरीदना शुरू कर दिया। 1974 तक सोने की कीमत लगभग 180 डॉलर प्रति औंस पहुंच गई। लेकिन इसके बाद बाजार में पहली बड़ी गिरावट भी आई और 1976 तक गोल्ड लगभग 100 डॉलर के आसपास आ गया।
इसके बाद दूसरी और ज्यादा तेज रैली शुरू हुई। 1978 के बाद तेजी इतनी तेज हुई कि जनवरी 1980 में गोल्ड लगभग 850 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच गया। यानी करीब एक दशक में सोना लगभग 24 गुना तक बढ़ गया। यह आधुनिक इतिहास की सबसे बड़ी कमोडिटी रैलियों में से एक मानी जाती है।
क्यों उछला था सोना?
1970 के दशक में दुनिया की अर्थव्यवस्था कई बड़े संकटों से गुजर रही थी और इन हालात ने सोने को निवेशकों का पसंदीदा एसेट बना दिया। 1973 में 1973 ऑयल क्राइसिस (Oil Crisis) हुआ, जब OPEC देशों ने तेल की कीमतों को तेजी से बढ़ा दिया। इससे वैश्विक महंगाई तेज हो गई और कई पश्चिमी अर्थव्यवस्थाएं महंगाई और धीमी आर्थिक वृद्धि के दौर में चली गईं।
1979 में ईरानी क्रांति (Iranian Revolution) और पश्चिम एशिया में तनाव ने भी बाजार में अनिश्चितता बढ़ा दी। इन घटनाओं ने निवेशकों को सुरक्षित निवेश की तलाश में सोने की तरफ मोड़ दिया। अमेरिका और यूरोप में महंगाई दो अंकों तक पहुंच गई थी। डॉलर पर भरोसा कमजोर होने लगा और सोना एक तरह से 'मुद्रा की सुरक्षा' के रूप में देखा जाने लगा।
1980 के बाद आई लंबी गिरावट
लेकिन गोल्ड की कहानी सिर्फ तेजी तक सीमित नहीं रही। 1980 के बाद इसमें लंबी गिरावट शुरू हो गई। उस समय अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजरव्ल के चेयरमैन Paul Volcker ने महंगाई को काबू करने के लिए ब्याज दरों को बेहद तेजी से बढ़ा दिया। कुछ समय के लिए अमेरिका में ब्याज दरें लगभग 20 प्रतिशत तक पहुंच गईं।
ऊंची ब्याज दरों की वजह से डॉलर मजबूत होने लगा और निवेशकों ने गोल्ड से पैसा निकालना शुरू कर दिया। इसके बाद गोल्ड की कीमत गिरकर लगभग 300 से 400 डॉलर के दायरे में आ गई। इसका मतलब 50% से ज्यादा भी गिरावट। सबसे बड़ी बात कि अगले कई सालों तक इसी रेंज के आसपास बनी रही।
1970 के दशक की गोल्ड कहानी निवेशकों के लिए एक बड़ा सबक भी है। जब आर्थिक संकट, महंगाई और मुद्रा पर भरोसा कमजोर होता है, तब सोना तेजी से चमक सकता है। लेकिन जैसे ही ब्याज दरें बढ़ती हैं और अर्थव्यवस्था स्थिर होती है, गोल्ड की चमक फीकी पड़ सकती है।
यही वजह है कि आज भी जब दुनिया में आर्थिक अनिश्चितता बढ़ती है, तो कई निवेशक 1970 के गोल्ड बुल रन को याद करते हैं। क्योंकि इतिहास बताता है कि संकट के समय सोना तेजी से ऊपर जा सकता है, लेकिन उसका सफर हमेशा सीधा नहीं होता।