Gold Price: नए दौर में सोना, अब ब्याज दर की परवाह नहीं; मोतीलाल ओसवाल ने बताया आगे किस ओर जाएगा भाव
Gold Price: सोना अब सिर्फ महंगाई या ब्याज दर की कहानी नहीं रहा। मोतीलाल ओसवाल के मुताबिक 5,000 डॉलर के पार की तेजी स्ट्रक्चरल बदलाव का संकेत है। केंद्रीय बैंक खरीद, सीमित सप्लाई और वैश्विक जोखिम आगे भी भाव को सहारा दे सकते हैं। जानिए डिटेल।
बढ़ते सरकारी घाटे और केंद्रीय बैंकों पर राजनीतिक दबाव भी सोने को सपोर्ट दे रहे हैं।
Gold Price: सोना अब ऐसे स्टेज में पहुंच चुका है, जिसे एनालिस्ट स्ट्रक्चरल रीप्राइसिंग कह रहे हैं। यानी कीमतों में बदलाव सिर्फ मांग और सप्लाई का खेल नहीं है, बल्कि वैश्विक वित्तीय सिस्टम में गहरे बदलाव इसका कारण बन रहे हैं। निवेशक और केंद्रीय बैंक अब सोने को अलग नजर से देख रहे हैं।
Motilal Oswal Financial Services की Precious Metals Quarterly Report के मुताबिक 2026 की शुरुआत में सोने का 5,000 डॉलर प्रति औंस से ऊपर जाना केवल साइक्लिकल तेजी नहीं है। यह मौद्रिक भरोसे, रिजर्व मैनेजमेंट और फिजिकल सप्लाई के ढांचे में बदलाव का संकेत है।
ब्याज दरों के पुराने नियम टूटे
आमतौर पर सोना रियल इंटरेस्ट रेट के उलट चलता है। लेकिन 2023 से 2025 के बीच रियल रेट सकारात्मक रहने के बावजूद सोने की कीमतें बढ़ीं। रिपोर्ट कहती है कि बाजार अब इन रियल रिटर्न की स्थिरता पर भरोसा नहीं कर रहा, खासकर जब सरकारी कर्ज रिकॉर्ड स्तर पर है और राजकोषीय दबाव बढ़ रहे हैं।
कमोडिटी एनालिस्ट मानव मोदी के मुताबिक, निवेशक रियल यील्ड को अस्थायी और नीतिगत मानते हैं। इसलिए सोना रखने की अवसर लागत कम महसूस होती है। अब सोना सिर्फ महंगाई से बचाव का साधन नहीं, बल्कि सिस्टमेटिक जोखिम के खिलाफ सुरक्षा बन रहा है।
यह बदलाव दिखाता है कि निवेशक अब हेडलाइन ब्याज दरों से ज्यादा लंबी अवधि की वित्तीय स्थिरता और केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता पर ध्यान दे रहे हैं।
भू-राजनीतिक तनाव और व्यापार विवाद
पूर्वी यूरोप, मध्य पूर्व, आर्कटिक और एशिया के कुछ हिस्सों में बढ़ते तनाव ने अनिश्चितता बढ़ाई है। इसके साथ ही नए व्यापार विवाद और टैरिफ से महंगाई और करेंसी में उतार चढ़ाव बढ़ा है।
ऐसे माहौल में सुरक्षित एसेट की मांग बढ़ती है। रिपोर्ट के मुताबिक धीमी ग्रोथ और चिपचिपी महंगाई के दौर में सोना एक न्यूट्रल वैल्यू स्टोर के रूप में मजबूत हुआ है।
राजकोषीय दबाव और केंद्रीय बैंकों पर असर
रिपोर्ट में कहा गया है कि बढ़ते सरकारी घाटे और केंद्रीय बैंकों पर राजनीतिक दबाव भी सोने को सपोर्ट दे रहे हैं। जब ग्रोथ धीमी हो और कर्ज ज्यादा हो, तब लंबे समय तक सख्त मौद्रिक नीति बनाए रखना मुश्किल हो जाता है।
Navneet Damani के मुताबिक, सोना अब नॉन सॉवरेन मनी की तरह देखा जा रहा है, यानी ऐसा एसेट जो राजनीतिक फैसलों से प्रभावित नहीं होता। इसी सोच ने सोने को सिर्फ हेज नहीं, बल्कि रणनीतिक रिजर्व एसेट बना दिया है।
फिजिकल सप्लाई की कमी भी कारण
सोने की मजबूती सिर्फ मैक्रो कारणों से नहीं है। वैश्विक खनन उत्पादन में तेज बढ़ोतरी नहीं हो रही। एक्सचेंजों पर इन्वेंटरी घटी है और नई खदानों को शुरू होने में समय और ज्यादा लागत लगती है। इससे बाजार में उपलब्ध धातु सीमित है और कीमतों को सहारा मिलता है।
भारत और ETF की भूमिका
भारत समेत कई उभरते बाजारों में मुद्रा कमजोरी से स्थानीय सोने की कीमतें बढ़ी हैं, जिससे घरेलू मांग मजबूत हुई है। ETF में भी कई सालों की निकासी के बाद दोबारा निवेश बढ़ा है। भारत अब पारंपरिक खरीद के साथ वित्तीय सोना उत्पादों में भी तेजी से उभर रहा है।
केंद्रीय बैंकों की लगातार खरीद
पिछले चार साल से केंद्रीय बैंक हर साल करीब 1,000 टन सोना खरीद रहे हैं। यह सिर्फ मौके का फायदा उठाने वाली खरीद नहीं, बल्कि रिजर्व डायवर्सिफाइड की रणनीति का हिस्सा है। डॉलर पर निर्भरता कम करना और प्रतिबंध जोखिम से बचना भी इसका कारण है।
सरकारी खरीदारी से बाजार में मजबूत मांग का आधार बना हुआ है, जिससे कीमतों में बड़ी गिरावट की संभावना कम होती है।
क्या गोल्ड में अस्थायी तेजी है?
मोतीलाल ओसवाल की रिपोर्ट का मानना है कि सोना 5,000 डॉलर प्रति औंस के आसपास और उससे ऊपर मजबूत रह सकता है। सीमित सप्लाई, रिजर्व डायवर्सिफाइड और भू-राजनीतिक जोखिम इसे सहारा देंगे।
यह तेजी पिछली महंगाई आधारित साइकिल से अलग है। यह वित्तीय और मौद्रिक सिस्टम में भरोसे की कमी और वैश्विक पोर्टफोलियो में सोने की भूमिका के नए आकलन को दिखाती है। अगर ये स्ट्रक्चरल कारण जारी रहते हैं, तो यह सिर्फ शॉर्ट टर्म उछाल नहीं, बल्कि लंबे समय का बदलाव हो सकता है।
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