Gold Silver Prices: युद्ध के बावजूद क्यों गिर रहे सोना-चांदी के दाम, 5 पॉइंट्स में समझिए पूरी तस्वीर
Gold Silver Prices: आमतौर पर युद्ध के समय सोना और चांदी की कीमतें बढ़ती हैं, लेकिन अमेरिका ईरान संघर्ष के बीच इनके दाम गिर रहे हैं। जानिए कौन से फैक्टर इस ट्रेंड को प्रभावित कर रहे हैं और आगे गोल्ड-सिल्वर की चाल कैसी रहने वाली है।
2022 के रूस यूक्रेन युद्ध के दौरान सोना आमतौर पर सबसे प्रमुख सुरक्षित निवेश के रूप में उभरा था।
Gold Silver Prices: अमेरिका और इजरायल की ओर से ईरान पर सैन्य हमले शुरू होने के करीब 10 दिन बाद एक दिलचस्प स्थिति देखने को मिल रही है। आमतौर पर किसी बड़े युद्ध या भू राजनीतिक संकट के समय सोना और चांदी की कीमतों में तेज उछाल आता है। लेकिन इस बार इसके उलट इनकी कीमतों में गिरावट देखने को मिली है।
28 फरवरी को जब संघर्ष शुरू हुआ, तब सोना करीब 5,416 डॉलर प्रति औंस पर था। इसके बाद युद्ध खाड़ी के अन्य देशों तक फैलने के बावजूद कीमत करीब 6 प्रतिशत गिरकर 9 मार्च को शाम 5.30 बजे तक लगभग 50,095 डॉलर प्रति औंस रह गई।
भारत में भी यही रुख दिखा। MCX पर 28 फरवरी को सोना करीब 1.67 लाख रुपये था, जो अब करीब 1.60 लाख रुपये रह गया है, यानी करीब 4.2 प्रतिशत की गिरावट। चांदी में गिरावट और ज्यादा तेज रही। MCX पर 28 फरवरी को चांदी करीब 2.89 लाख रुपये प्रति किलो थी, जो 9 मार्च तक गिरकर करीब 2.63 लाख रुपये रह गई, यानी करीब 9 प्रतिशत की गिरावट।
आइए जानते हैं कि आखिर युद्ध के बावजूद सोने और चांदी के दाम क्यों नहीं बढ़ रहे और आगे के लिए क्या संकेत हैं।
1. डॉलर की मजबूती ने तेजी को रोका
सोना और चांदी की कीमतों में तेजी नहीं आने की सबसे बड़ी वजह अमेरिकी डॉलर का मजबूत होना माना जा रहा है। साथ ही अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों में कटौती को लेकर बदलती उम्मीदों ने भी निवेशकों के रुख को प्रभावित किया है।
पश्चिम एशिया जैसे तेल उत्पादक क्षेत्र में जब भी संघर्ष होता है तो आमतौर पर कच्चे तेल की कीमतें बढ़ जाती हैं। चूंकि वैश्विक बाजार में तेल का कारोबार ज्यादातर डॉलर में होता है, इसलिए ऐसे समय में डॉलर की मांग भी बढ़ जाती है। इससे डॉलर मजबूत हो जाता है और सोने की कीमतों पर दबाव बनता है।
2. हालिया तेजी के बाद मुनाफावसूली
दूसरी बड़ी वजह मुनाफावसूली भी हो सकती है। बाजार के कई खिलाड़ी यह आकलन कर रहे हैं कि यह संघर्ष सीमित क्षेत्र तक ही रहेगा या ज्यादा लंबे समय तक नहीं चलेगा।
कोटक म्यूचुअल फंड के फंड मैनेजर सतीश डोंडापाटी के मुताबिक, पिछले कुछ महीनों में सोना और चांदी पहले ही काफी तेजी दिखा चुके थे। ऐसे में युद्ध की खबर के बाद जब कीमतों में उछाल आया तो कई निवेशकों ने मुनाफावसूली शुरू कर दी।
उन्होंने कहा, 'पिछले कुछ महीनों में सोना और चांदी में मजबूत तेजी आई थी। ऐसे में खबर आने के बाद जब कीमतें ऊपर गईं तो कई निवेशकों ने मुनाफा बुक कर लिया, जिससे तेजी टिक नहीं सकी और कीमतों में गिरावट आ गई।'
3. सुरक्षित निवेश के विकल्प बढ़ने से मांग बंटी
तीसरी वजह यह है कि अनिश्चितता के समय निवेशक केवल सोने की ओर ही नहीं जा रहे हैं। कई निवेशक अमेरिकी ट्रेजरी और डॉलर आधारित एसेट्स में भी पैसा लगा रहे हैं, जिन्हें सुरक्षित निवेश माना जाता है।
चूंकि निवेशकों के पास अब सुरक्षित निवेश के कई विकल्प मौजूद हैं, इसलिए पैसा अलग अलग एसेट्स में बंट रहा है। इसका असर यह हुआ है कि सोने की कीमतों में तेज उछाल नहीं आ पा रहा है।
4. शेयर बाजार की गिरावट से भी पड़ा दबाव
शेयर बाजारों में आई गिरावट भी इसकी एक वजह हो सकती है। सेंसेक्स और निफ्टी करीब 1.7 प्रतिशत की गिरावट के साथ बंद हुए और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के कारण बाजार 11 महीने के निचले स्तर तक पहुंच गया।
डोंडापाटी के मुताबिक, जब इक्विटी बाजार में तेज गिरावट आती है तो कई निवेशक नकदी जुटाने के लिए सोना बेच देते हैं। पिछले एक साल में सोने ने अच्छा रिटर्न दिया है, इसलिए कुछ निवेशक दूसरे एसेट्स में हुए नुकसान की भरपाई के लिए सोना बेच रहे हैं। इससे कीमतों पर शॉर्ट टर्म के लिए दबाव बन रहा है।
5. ऊंची वैश्विक ब्याज दरों का भी असर
एक और बड़ी वजह वैश्विक स्तर पर ऊंची ब्याज दरें भी हैं। जब ब्याज दरें ज्यादा होती हैं तो बॉन्ड और अन्य ब्याज देने वाले एसेट्स सोने की तुलना में ज्यादा आकर्षक लगने लगते हैं।
इंडिया बुलियन एंड ज्वैलर्स एसोसिएशन यानी IBJA की उपाध्यक्ष और एस्पेक्ट ग्लोबल वेंचर्स की एग्जीक्यूटिव चेयरपर्सन अक्ष कंबोज के मुताबिक, अमेरिकी डॉलर की मजबूती और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी सोने की कीमतों को ऊपर जाने से रोक रही है। इसके पीछे महंगाई और ब्याज दरों में कटौती में देरी की उम्मीदें भी एक वजह हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि युद्ध के कारण संभावित तेल की कमी की आशंका में निवेशकों का पैसा फिलहाल कच्चे तेल की ओर भी जा रहा है। इसी वजह से सोने की कीमतों में फिलहाल ठहराव देखने को मिल रहा है।
रूस यूक्रेन युद्ध से अलग क्यों है मौजूदा स्थिति
पहले के भू राजनीतिक संकटों में, खासकर 2022 के रूस यूक्रेन युद्ध के दौरान, सोना आमतौर पर सबसे प्रमुख सुरक्षित निवेश के रूप में उभरा था। उस समय निवेशकों ने अनिश्चितता से बचने के लिए बड़ी मात्रा में सोना खरीदा था। लेकिन अमेरिका ईरान संघर्ष एक अलग बाजार माहौल में हो रहा है।
ऑगमोंट की रिसर्च हेड रेनिशा चैनानी के मुताबिक, रूस यूक्रेन संकट की तुलना में इस समय सबसे बड़ा अंतर यह है कि अमेरिकी डॉलर और अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड दोनों काफी मजबूत हैं। इससे सोने का सुरक्षित निवेश वाला आकर्षण कुछ कम हो गया है।
उन्होंने कहा कि जब यील्ड बढ़ती है तो बिना ब्याज वाले एसेट जैसे सोना रखने की लागत बढ़ जाती है। इसके अलावा आज के समय में वित्तीय बाजार पहले की तुलना में ज्यादा विविध हो गए हैं। निवेशक अब डॉलर, एनर्जी एसेट्स और डिफेंस स्टॉक्स जैसे दूसरे विकल्पों में भी पैसा लगा रहे हैं। यही वजह है कि संघर्ष की तीव्रता के बावजूद सोने की कीमतों में भू राजनीतिक प्रीमियम सीमित दिखाई दे रहा है।
युद्ध ज्यादा लंबा खिंचने के आसार नहीं?
एक और वजह निवेशकों की पोजिशनिंग भी हो सकती है। 2025 में सोने की कीमतों में पहले ही मजबूत तेजी आ चुकी थी। ऐसे में कई निवेशक पहले ही सोने में निवेश कर चुके थे। इस वजह से जब संघर्ष बढ़ा तो नई खरीदारी के लिए ज्यादा जगह नहीं बची। इसलिए कीमतों में बहुत बड़ी तेजी देखने को नहीं मिली।
एनालिस्टों का मानना है कि बाजार फिलहाल यह मानकर चल रहा है कि यह संघर्ष सीमित रह सकता है और लंबा वैश्विक युद्ध नहीं बनेगा। सतीश डोंडापाटी के मुताबिक, बाजार को लगता है कि यह संघर्ष सीमित दायरे में ही रह सकता है। इसी वजह से सोने में घबराहट वाली खरीदारी यानी पैनिक बाइंग बहुत मजबूत नहीं दिख रही है।
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