Inflation vs Savings: पैसों के लिए दीमक की तरह है महंगाई, जानिए इससे मुकाबले का तरीका
Inflation vs Savings: महंगाई धीरे धीरे आपकी बचत की असली कीमत को कम कर देती है। बैंक में पैसा सुरक्षित दिखता है, लेकिन उसकी ताकत घटती रहती है। जानिए कैसे सही निवेश रणनीति अपनाकर अपनी बचत को महंगाई के असर से बचाया जा सकता है।
ज्यादातर बचत खातों पर अभी भी करीब 3 से 4 प्रतिशत ब्याज मिलता है।
Inflation vs Savings: कुछ साल पहले तक कई परिवारों के लिए महीने का 3,000 रुपये का किराना बिल सामान्य माना जाता था। आज कई शहरों में यही खर्च बढ़कर करीब 5,000 रुपये तक पहुंच गया है। स्कूल की फीस, बिजली के बिल और यहां तक कि कैब जैसी रोजमर्रा की सेवाएं भी धीरे धीरे महंगी होती गई हैं। बाहर खाना खाना भी अब पहले की तुलना में काफी ज्यादा खर्चीला हो गया है।
समस्या यह है कि कई लोगों की बचत उसी रफ्तार से नहीं बढ़ रही, जिस तेजी से खर्च बढ़ रहे हैं। अगर आपकी आय या निवेश धीरे बढ़ रहे हों और रोजमर्रा का खर्च तेजी से बढ़ रहा हो, तो यह फर्क तुरंत नजर नहीं आता। लेकिन कुछ साल बाद पता चलता है कि बचत की रकम भले वही है, मगर उससे खरीदी जा सकने वाली चीजें कम हो गई हैं।
बैंक में पड़े पैसे की ताकत क्यों घट जाती है?
कई लोग मानते हैं कि बैंक में पड़ा पैसा पूरी तरह सुरक्षित है। तकनीकी रूप से यह सही है, क्योंकि रकम खत्म नहीं होती। लेकिन सुरक्षा और बढ़त दो अलग बातें हैं।
भारत में ज्यादातर बचत खातों पर अभी भी करीब 3 से 4 प्रतिशत ब्याज मिलता है। अगर महंगाई करीब 6 प्रतिशत के आसपास है, तो बैंक में रखा पैसा धीरे धीरे अपनी असली कीमत खोता रहता है, भले ही खाते में बैलेंस बढ़ता हुआ दिखाई दे।
यह बदलाव तुरंत नजर नहीं आता। लेकिन पांच या दस साल बाद साफ दिखने लगता है कि वही बचत अब पहले जितनी दूर तक नहीं चल पा रही।
FD में स्थिर रिटर्न मिलता है, लेकिन...
फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) इसलिए लोकप्रिय हैं क्योंकि इनमें रिटर्न पहले से तय होता है। निवेश करते समय ही पता होता है कि कितना ब्याज मिलेगा और पैसा कब मैच्योर होगा।
लेकिन जब टैक्स को शामिल किया जाता है, तो असली रिटर्न कम हो सकता है। उदाहरण के लिए अगर किसी को 7 प्रतिशत ब्याज मिल रहा है और वह ऊंचे टैक्स स्लैब में है, तो टैक्स के बाद यह रिटर्न करीब 5 प्रतिशत के आसपास रह सकता है।
अगर उसी समय महंगाई भी इसी स्तर पर हो, तो फिक्स्ड डिपॉजिट का काम केवल पैसे की कीमत को बनाए रखना रह जाता है, उससे ज्यादा बढ़त नहीं मिलती।
इसका मतलब यह नहीं है कि फिक्स्ड डिपॉजिट खराब निवेश हैं। वे छोटी अवधि की बचत और स्थिरता के लिए अब भी उपयोगी हैं। समस्या तब पैदा होती है जब लंबे समय के लक्ष्यों के लिए केवल इन्हीं पर निर्भर रहा जाए।
पैसों को महंगाई की मार से कैसे बचाएं?
ऐसे लक्ष्य जो 10 या 15 साल दूर हों, उनके लिए अक्सर अलग रणनीति की जरूरत होती है। लंबे समय में कारोबार और कंपनियां आम तौर पर अर्थव्यवस्था के साथ बढ़ती हैं। कंपनियां अपने उत्पाद ज्यादा बेचती हैं, कारोबार फैलाती हैं और लागत बढ़ने पर कीमतों को भी एडजस्ट करती हैं। यही बढ़त समय के साथ शेयर की कीमतों में भी दिखाई देती है।
इसी वजह से कई लंबी अवधि के निवेश पोर्टफोलियो में इक्विटी म्यूचुअल फंड या शेयरों में निवेश शामिल किया जाता है। ये हर साल स्थिर रिटर्न नहीं देते, लेकिन लंबे समय में इनके महंगाई से आगे निकलने की संभावना ज्यादा मानी जाती है।
निवेश को अलग-अलग बांटना क्यों जरूरी
कोई भी निवेश हर समय अच्छा प्रदर्शन नहीं करता। कुछ साल शेयर बाजार बेहतर चलता है, तो कुछ साल फिक्स्ड इनकम ज्यादा स्थिर रहता है। वहीं अनिश्चितता के दौर में सोना अच्छा प्रदर्शन कर सकता है। इसी वजह से कई निवेशक अपना पैसा अलग अलग निवेश विकल्पों में बांटते हैं, ताकि जोखिम कम किया जा सके।
इसका फायदा यह होता है कि अगर पोर्टफोलियो का एक हिस्सा कमजोर प्रदर्शन करे, तो दूसरा हिस्सा उसे संतुलित कर सकता है। समय के साथ यह संतुलन बचत को महंगाई के असर से बचाने में मदद करता है।
आखिर असली लक्ष्य क्या है
महंगाई लगभग हर अर्थव्यवस्था की स्थायी सच्चाई है। समय के साथ कीमतों का बढ़ना लगभग तय होता है। इसलिए लक्ष्य महंगाई को खत्म करना नहीं है, क्योंकि यह संभव नहीं है। असली लक्ष्य यह होना चाहिए कि आपका पैसा इतनी तेजी से बढ़े कि भविष्य में आपकी खरीदने की क्षमता सुरक्षित रहे।
चुनौती सिर्फ पैसा बचाने की नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करने की है कि आपकी बचत भविष्य में उस जीवन स्तर को बनाए रख सके, जिसे आप हासिल करना चाहते हैं।
Disclaimer:यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।