एक परिवार को पुराने समय से संभालकर रखे गए शेयर विरासत में मिले। वक्त बीता, जरूरत आई तो उन्हें बेचने का फैसला किया गया। लेकिन सबसे बड़ा सवाल सामने था, इनकी खरीद कीमत यानी कॉस्ट क्या मानी जाए? यही कन्फ्यूजन आज कई निवेशकों की है। अच्छी बात यह है कि टैक्स के नियम इस मामले में साफ हैं, बस उन्हें सही तरीके से समझने की जरूरत है।
अगर किसी को माता-पिता, दादा-दादी से विरासत में शेयर मिलते हैं, तो उन्हें बेचते समय कैपिटल गेन (Capital Gain) निकालना थोड़ा मुश्किल हो सकता है। खासकर तब जब खरीद कीमत (Cost) की जानकारी न हो। एक्सपर्ट के मुताबिक यदि शेयर गिफ्ट या विरासत में मिले हैं, तो उनकी खरीद कीमत वही मानी जाती है जो मूल मालिक (Previous Owner) ने चुकाई थी। साथ ही होल्डिंग पीरियड भी पहले मालिक से जोड़कर गिना जाता है। यानी अगर कुल मिलाकर शेयर 12 महीने से ज्यादा समय तक रखे गए हैं, तो उन पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन (LTCG) टैक्स लागू होगा।
लेकिन कई बार ऐसा होता है कि पुराने रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होते। ऐसे मामलों में निवेशक एक खास विकल्प चुन सकते हैं। वे 31 जनवरी 2018 को शेयर का जो बाजार भाव था, उसे अपनी खरीद कीमत मान सकते हैं। इससे टैक्स कैलकुलेशन आसान हो जाता है। वहीं, 31 जनवरी 2018 के बाद मिले बोनस शेयरों की लागत शून्य (Nil) मानी जाती है।
एक अहम बात यह है कि विरासत में शेयर मिलने पर कोई टैक्स नहीं लगता। यानी जब पत्नी को ये शेयर मिले, उस समय कोई टैक्स देनदारी नहीं बनी। इसी तरह अगर वह ये शेयर अपनी बेटी को गिफ्ट करती हैं, तब भी कोई टैक्स नहीं लगेगा, क्योंकि माता-पिता से मिले गिफ्ट को इनकम नहीं माना जाता।
हालांकि, जब बेटी भविष्य में इन शेयरों को बेचेगी, तब उसे कैपिटल गेन टैक्स देना होगा। उस समय भी लागत और होल्डिंग पीरियड वही माना जाएगा जो पहले मालिक से जुड़ा हुआ है। एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि शेयर गिफ्ट करते समय एक गिफ्ट डीड (Gift Deed) जरूर बनानी चाहिए, ताकि भविष्य में कोई कानूनी या टैक्स से जुड़ी परेशानी न हो। अगर बेटी नाबालिग है, तो इन शेयरों से होने वाली इनकम उस माता-पिता की आय में जोड़ी जाएगी, जिसकी इनकम ज्यादा है। हालांकि, इसमें प्रति बच्चे 1,500 रुपये तक की छूट मिलती है।