पिछले कुछ सालों में NGO सेक्टर के लिए नियमों में कई बदलाव किए गए हैं। दरअसल, सरकार एनजीओ को लेकर सख्ती बढ़ा रही है। चैरिटेबल और रिलिजियस ट्रस्ट्स और दूसरे संस्थानों के रजिस्ट्रेशन और कंप्लायंस के नियमों को सख्त बनाया जा रहा है। चैरिटेबल और रिलिजियस ट्रस्ट्स, सोसायटीज और कंपनियों का रजिस्ट्रेशन कंपनीज एक्ट 2013 के सेक्शन 8 के तहत होता है। इन्हें इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन 10, 11, 12 और 80G के तहत कई तरह के एग्जेम्प्शंस और एप्रूवल्स मिलते हैं। हालांकि, ये एग्जेम्प्शंस और बेनेफिट हासिल करने के लिए इन्हें कुछ शर्तें पूरी करनी होती है।
यूनियन बजट में भी नियमों में कई बदलाव
यूनियन बजट 2023 में भी NGO से जुड़े इनकम टैक्स के नियमों में कई बदलाव किए गए हैं। अब इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने चैरिटेबल एवं रिलिजियस ट्रस्ट्स, सोसायटीज और दूसरे इंस्टीट्यूशंस के ऑडिट के लिए नए नियम नोटिफाई कर दिए हैं। ये 1 अप्रैल, 2023 से लागू होंगे। इस फाइनेंशियल ईयर (2022-23) के लिए ट्रस्ट्स एंव इंस्टीट्यूशंस के ऑडिट के लिए नए फॉर्म्स का इस्तेमाल होगा। नए फॉर्म्स में पहले के फॉर्म्स के मुकाबले काफी डिटेल जानकारियां देनी हैं। टैक्स ऑडिट के तहत जरूरी कई क्लॉज को भी फॉर्म में शामिल किया गया है।
ऑडिटर्स को अब ट्रस्ट्स के लिए इस्तेमाल होने वाले दर तरह के ऑडिट फॉर्म्स में सही फॉर्म का चुनाव करना होगा।
(I) फॉर्म 10B-यह फॉर्म ऐसे ट्रस्ट्स के लिए जिनकी इनकम 5 करोड़ रुपये से ज्यादा है या ट्रस्ट्स को विदेश से कोई पैसा मिला है या इनकम के किसी हिस्से को इंडिया से बाहर खर्च नहीं किया है
(II) फॉर्म 10BB- यह फॉर्म ऐसे सभी मामलों पर लागू होगा, जो ऊपर बताए गए फॉर्म 10B के तहत नहीं आते हैं, ये हैं:
-जहां ट्रस्ट की इनकम 5 करोड़ रुपये तक है और
-किसी तरह का फॉरेन कंट्रिब्यूशन नहीं मिला है और
-उसके इनकम के किसी हिस्से को इंडिया से बाहर खर्च नहीं किया गया है
ऑडिट के लिए जरूरी नए नियम के मुताबिक, ऑडिटर्स को ऐसे मामलों पर अतिरिक्त जानकारी देनी होगी
-ऐसे फाउंडर्स/सोसायटी मेंबर्स आदि की डिटेल जिनकी शेयरहोल्डिंग 5 फीसदी या इससे ज्यादा है
-रजिस्ट्रेशन/एप्रूवल और एक्टिविटीज शुरू होने की डिटेल्स
-बुक्स ऑफ अकाउंट्स की डिटेल्स
-डोनेशंस, फॉरेन डोनेशंस और एनोनिमस डोनेशंस आदि की डिटेल्स
-इनकम ऑफ ट्रस्ट/इंस्टीट्यूशं के अप्लिकेशन की स्थिति में ज्यादा डिटेल्स
-इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन 115BII के तहत टैक्सेबल इनकम
-एसेट्स के डिप्रेसिएशन की डिटेल्स जिन्हें पहले अप्लिकेशन ऑफ इनकम के रूप में क्लेम किया गया हो
-टीडीएस और टीसीएस की डिटेल्स
-ट्रस्ट के एक्सपेंसेज के डिसअलाउन्स से संबंधित डिटेल्स
-स्पेशिफायड वायोलेंशन से संबंधित डिटेल्स आदि
उपर्युक्त बदलाव से ट्रस्ट्स/इंस्टीट्यूशंस के लिए कंप्लायंस की कॉस्ट बढ़ जाएगी और ऑडिटर्स की जिम्मेदारियां बढ़ जाएगी। साथ ही इससे इनकम टैक्स डिपार्टमेंट की तरफ से एनजीओ पर कंट्रोल और मॉनिटरिंग बढ़ जाएगी। इसकी अच्छी बात यह है कि इससे ऐसे ट्रस्ट्स और इंस्टीट्यूशंस के गलत कामों पर रोक लग जाएगी जो इनकम टैक्स कानून के तहत मिले फायदे तो उठा रहे हैं लेकिन वे वह काम नहीं कर रहे हैं, जिनके लिए उन्होंने रजिस्ट्रेशन कराया है।
(अभिषेक अनेजा सीए हैं। वह इनकम टैक्स और पर्सनल फाइनेंस के मामलों के एक्सपर्ट हैं)