आज हर कोई हर चीज जल्दी चाहता है- कैब, ग्रॉसरी, मेड, खाना… सब कुछ तुरंत। अब बैंक अकाउंट भी मिनटों में खुल जाता है और UPI पेमेंट तो उससे भी तेज है। यही जल्दबाजी अब हमारी निवेश की आदत में भी दिखने लगी है।

आज हर कोई हर चीज जल्दी चाहता है- कैब, ग्रॉसरी, मेड, खाना… सब कुछ तुरंत। अब बैंक अकाउंट भी मिनटों में खुल जाता है और UPI पेमेंट तो उससे भी तेज है। यही जल्दबाजी अब हमारी निवेश की आदत में भी दिखने लगी है।
पहले लोग लंबी अवधि के लिए निवेश करते थे, फिर यह शॉर्ट टर्म हुआ और अब F&O तक पहुंच गया है। लोग इंतजार नहीं करना चाहते, उन्हें तुरंत रिजल्ट चाहिए। लेकिन इस जल्दी के पीछे एक बड़ा जोखिम छिपा है- जितना ज्यादा रिटर्न पाने की कोशिश करेंगे, जोखिम उतनी ही तेजी से बढ़ेगा।
Aureva Capital Private Limited के को-फाउंडर पारस सिंघल ने मार्केट के जोखिम को आईपीएल और एक्सप्रेसवे के सफर से जोड़कर समझाया है। उनके मुताबिक, कि आप कम जोखिम में ज्यादा फायदा सकते हैं।
IPL का उदाहरण क्या कहता है
पारस सिंघल का कहना है, 'हमने IPL 2025 और 2024 के टॉप 10 स्कोरर्स का डेटा देखा और उनके करियर औसत और स्ट्राइक रेट की तुलना की। एक साफ पैटर्न दिखा... एक सीमा के बाद स्ट्राइक रेट बढ़ने के साथ बल्लेबाज का औसत तेजी से गिरने लगता है।'
उदाहरण के लिए, 132 स्ट्राइक रेट (विराट कोहली) पर बल्लेबाज करीब 40 रन प्रति पारी बनाता है। लेकिन 163 स्ट्राइक रेट (अभिषेक शर्मा, निकोलस पूरन) पर औसत घटकर 27-30 रन रह जाता है। यानी तेजी से रन बनाने की कीमत, जल्दी आउट होना है।
एक्सप्रेसवे का आसान उदाहरण
पारस सिंघल मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे पर सफर का भी उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि मान लीजिए आप 80 किमी/घंटा की रफ्तार पर आप करीब 75 मिनट में पहुंचते हैं और इसमें जोखिम भी कम रहता है।
अगर आप 100 किमी/घंटा पर जाते हैं, तो करीब 15 मिनट बचते हैं और जोखिम अभी भी कंट्रोल में रहता है। लेकिन 120 या 140 किमी/घंटा पर जाने पर समय की बचत बहुत कम होती है... 10 से करीब 7 मिनट। मगर दुर्घटना का खतरा काफी तेजी से बढ़ जाता है। यानी फायदा कम होता जाता है, लेकिन जोखिम तेजी से बढ़ता है।
निवेश में भी यही गणित चलता है
सिंघल का कहना है कि ज्यादातर निवेशक ज्यादा रिटर्न के चक्कर में जरूरत से ज्यादा इक्विटी ले लेते हैं। वे वोलैटिलिटी को नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि वही तय करती है कि पोर्टफोलियो कितनी बार गिर सकता है और आप कितने समय तक टिक पाएंगे।
23 साल (2003-2025) के डेटा में देखा गया कि 50:50 पोर्टफोलियो से 100% इक्विटी पर जाने से CAGR 13.14% से बढ़कर 16.06% हो जाता है। यानी करीब 22% का इजाफा। लेकिन वोलैटिलिटी 10.27% से बढ़कर 20.65% हो जाती है। यानी जोखिम में 101% की छलांग। इसका मतलब कि रिटर्न थोड़ा बढ़ता है, लेकिन जोखिम बहुत ज्यादा बढ़ जाता है।
सबसे बड़ा सबक क्या है
सिंघल के मुताबिक, चाहे एक्सप्रेसवे हो, IPL का मैदान हो या शेयर बाजार... हर जगह एक 'सही संतुलन' होता है। इसके बाद हर अतिरिक्त रिटर्न के साथ जोखिम बहुत तेजी से बढ़ता है।
बहुत तेज ड्राइव करने वाला जल्दी पहुंच सकता है, लेकिन दुर्घटना का खतरा भी बढ़ जाता है। आक्रामक बल्लेबाज तेजी से रन बनाता है, लेकिन जल्दी आउट भी होता है। इसी तरह बहुत आक्रामक निवेश आपको ज्यादा रिटर्न दे सकता है। लेकिन इसमें बड़ी गिरावट, घबराहट और गलत समय पर बाहर निकलने का खतरा भी बढ़ जाता है।
सिंघल का कहना है कि छोटे कदमों से, लंबे समय तक टिके रहना चाहिए। यही असली स्ट्रैटेजी है। धीरे-धीरे ही बड़ा पैसा बनता है। पूरी जिंदगी की कंपाउंडिंग को कुछ मिनट की तेजी के लिए दांव पर लगाना सही नहीं है।
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