आईटी शेयरों के लिए 4 फरवरी अच्छा नहीं रहा। निफ्टी आईटी इंडेक्स 6 फीसदी से ज्यादा गिर गया। टीसीएस, इंफोसिस, एचसीएल टेक, विप्रो जैसी दिग्गज आईटी कंपनियों के शेयरों में बड़ी गिरावट आई। इसका असर म्यूचुअल फंड्स के निवेशकों पर भी पड़ेगा।
आईटी शेयरों के लिए 4 फरवरी अच्छा नहीं रहा। निफ्टी आईटी इंडेक्स 6 फीसदी से ज्यादा गिर गया। टीसीएस, इंफोसिस, एचसीएल टेक, विप्रो जैसी दिग्गज आईटी कंपनियों के शेयरों में बड़ी गिरावट आई। इसका असर म्यूचुअल फंड्स के निवेशकों पर भी पड़ेगा।
आईटी शेयरो में क्यों आई बड़ी गिरावट?
बीते कुछ सालों में आईटी फंड्स में निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ी थी। लेकिन, एक दिन में दिग्गज कंपनियों के शेयरों में 7 फीसदी तक की गिरावट ने निवेशकों को हिला दिया है। एंथ्रोपिक का एआई टूल आईटी इंडस्ट्री में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है। इसका निगेटिव असर आईटी कंपनियों पर पड़ सकता है। चूंकि कई टेक्नोलॉजी फंडों ने बड़ी आईटी कंपनियों के शेयरों में ब़ड़ा निवेश किया है, जिससे उनके एनएवी पर आईटी शेयरों में गिरावट का असर दिखेगा।
क्या इस करेक्शन का इस्तेमाल नए निवेश के लिए करना चाहिए?
फाइनेंशियल मेंटॉर किरांग गांधी ने कहा, "अगर टेक्नोलॉजी शेयरों में 10 फीसदी से कम कम निवेश है तो निवेशकों को इस गिरावट को सेक्टर से जुड़ी साइकिल की तरह लेना चाहिए और अपना निवेश बनाए रखना चाहिए।" उन्होंने कहा कि एआई अभी विकास के दौर से गुजर रहा है। इसलिए इस करेक्शन से अपना निवेश निकालने की जगह इसे लंबी अवधि के निवेश के मौके के रूप में लेना चाहिए।
टेक्नोलॉजी में ऐलोकेशन ज्याद होने पर क्या करना चाहिए?
एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर टेक्नोलॉजी स्टॉक्स में 15-30 फीसदी ऐलोकेशन है तो फिर उसका असर ज्यादा पड़ेगा। स्टॉकटिक कैपिटल के फाउंडर विजय माहेश्वरी ने कहा, "एक्सपोजर लेवल ज्यादा होने से टेक्नोलॉजी एक थीम नहीं रह जाती है। यह पोर्टफोलियो के लिए रिस्क फैक्टर बन जाता है।" दूसरे एक्सपर्ट्स का भी कहना है कि अगर एक्सपोजर लेवल ज्यादा है तो फिर एक्शन जरूरी है।
क्या यह समय रीबैलेंसिंग का है?
गांधी ने कहा, "अगर इनवेस्टर ने थिमैटिक टेक फंड में ज्यादा निवेश किया है तो यह समय रीबैलेंसिंग का है। ज्यादा समय तक शेयरों में कमजोरी बने रहने पर कंस्ट्रेशन रिस्क का असर पोर्टफोलियो पर पड़ सकता है। फ्लेक्सी-कैप या मल्टी-एसेट फंड्स में धीरे-धीरे डायवर्सिफिकेशन से यह रिस्क कम हो सकता है।" एक्सपर्ट्स का कहना है कि रीबैलेंसिंग का मतलब टेक्नोलॉजी शेयरों से पूरी तरह से एग्जिट नहीं है।
SIP के निवेशकों को क्या करना चाहिए?
सिप के निवेशक आम तौर पर यह सोचते हैं कि निवेश जारी रखने पर अपने आप मार्केट रिस्क कम हो जाता है। सिप से कॉस्ट को एवरेज करने में मदद मिलती है। लेकिन इससे बिजनेस मॉडल में अनिश्चितता या वैल्यूएशन कंप्रेशन रिस्क कम नहीं होता है। माहेश्वरी ने कहा, "सिप को लेकर फैसला हाल में कीमतों में आई गिरावट की जगह इस इस बात पर निर्भर करना चाहिए कि यह फंड आपके पोर्टफोलियो में क्यों है।"
एक आसान तरीका यह है कि आपको पहले यह देखना है कि आपके कुल सिप ऐलोकेशन में टेक फंड की हिस्सेदारी कितनी है। अगर यह हिस्सेदारी 10-12 फीसदी से ज्यादा नहीं है तो आप सिप को जारी रख सकते हैं। अगर यह हिस्सेदारी 20 फीसदी से ज्यादा है तो आगे जाने वाली सिप की किस्तों की रीबैलेंसिंग जरूरी है।
जिन निवेशकों ने टेक फंड्स में हाल में हाई लेवल पर निवेश किया है उन्हें एवरेजिंग करने का आइडिया अट्रैक्टिव लग सकता है। लेकिन, एक्सपर्ट्स का कहना है कि हर गिरावट को एक तरह से नहीं लिया जा सकता। माहेश्वरी ने कहा कि सिर्फ कीमतों में गिरावट से एवरेजिंग करना निवेश नहीं है। उतार-चढ़ाव के दौरान शेयरों के सस्ता होने से ज्यादा अहम यह है कि पूरी तस्वीर कैसी है।
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