New Labour Codes Rules Impact: नए लेबर कानून के सभी नियम आए सामने, सैलरी से पीएफ तक ऐसे डालेंगे असर

New Labour Codes Rules Impact: नए लेबर कोड्स के नियमों का नोटिफिकेशन आ गया है और यह लागू हो गया है। नए कानूनों ने 29 लेबर कानूनों की जगह ले ली है। जानिए कि नए लेबर कोड्स से सैलरी से लेकर काम करने की जगह को लेकर क्या बदलाव आ सकता है और देश के किसी भी राज्य में काम करने वाले एंप्लॉयीज पर इसका कैसे असर पड़ेगा

अपडेटेड May 12, 2026 पर 2:29 PM
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New Labour Codes Rules Impact: नए लेबर कोड से जुड़े नियमों का नोटिफिकेशन आ गया है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक इन नियमों से सैलरी के ढांचे, वर्कप्लेस की प्रक्रियाओं और कंप्लॉयंस सिस्टम में बदलाव आ सकता है तो राज्य भी इन नियमों के मुताबिक खुद को ढालने की प्रक्रिया भी शुरू कर सकते हैं।

New Labour Codes Rules Impact: नए लेबर कोड से जुड़े नियमों का नोटिफिकेशन आ गया है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक इन नियमों से सैलरी के ढांचे, वर्कप्लेस की प्रक्रियाओं और कंप्लॉयंस सिस्टम में बदलाव आ सकता है तो राज्य भी इन नियमों के मुताबिक खुद को ढालने की प्रक्रिया भी शुरू कर सकते हैं। बता दें कि केंद्र सरकार ने हाल ही में ऑफिशियल गजट में नियमों के आखिरी सेट को नोटिफाई कर चारों लेबर कोड को आखिरकार लागू कर दिया है जिससे कंसालिडेटेड लेबर लॉ फ्रेमवर्क को लागू करने की प्रक्रिया पूरी हो गई है। नए कानूनों ने 29 लेबर कानूनों की जगह ले ली है। चार कोड्स में वेतन, औद्योगिक संबंध, सोशल सिक्योरिटी और काम से जुड़ी सुरक्षा और वर्किंग परिस्थितियां को कवर किया गया है।

EY इंडिया में पीपल एडवाइजरी सर्विसेज-टैक्स के पार्टनर पुनीत गुप्ता का कहना है कि इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड और वेजेज कोड (Code on Wages) के तहत केंद्रीय नियमों की अधिसूचना लेबर रिफॉर्म को लागू करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। पुनीत का कहना है कि ये कानून मुख्य रूप से उन क्षेत्रों पर लागू होंगे, जहां केंद्र सरकार प्रभावी है जैसे कि टेलीकॉम, बैंकिंग, बीमा, माइनिंग, ऑयल फील्ड्स, प्रमुख बंदरगाह, एयर ट्रांसपोर्ट और केंद्रीय पीएसयू। उनका कहना है कि ये नियम राज्यों को लेबर कोड्स के तहत अपने खुद के नियम रेफरेंस फ्रेमवर्क के तौर पर काम करेंगे।

क्या बदलेगा वेतन से जुड़े फ्रेमवर्क में?


पुनीत का कहना है कि इन नियमों से न्यूनतम मजदूरी, काम करने के घंटे और वेतन से जुड़ी प्रक्रियाओं में अधिक स्पष्टता आई है। नए लेबर फ्रेमवर्क के तहत सामान्य रूप में एक हफ्ते में काम करने के अधिकतम घंटे 48 रखे गए हैं। साथ ही इसमें जुर्माना, एडवांसेज, नुकसान और लोन जैसी कटौतियों से जुड़ी प्रक्रियाएं निर्धारित की गई हैं। इसमें कंपनियों को कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले एंप्लॉयीज को बोनस देने की जिम्मेदारी को भी औपचारिक किया गया है तो एंप्लॉयी रजिस्टर्स, सैलरी रिकॉर्ड्स, एटेंडेंस रजिस्टर्स और सैलरी स्लिप का एक मानक प्रारुप बनाया गया है। इसमें एंप्लॉयीज के लिए एक फॉर्मल नॉमिनेशन मैकेनिज्म भी पेश किया गया है।

राज्यों में नियमों को लागू करना होगा अहम

जेएसए एडवोकेट्स एंड सॉलिसिटर्स के पार्टनर Sajai Singh का कहना है कि लेबर कोड्स फ्रेमवर्क के कई पहलू अभी भी स्टेल लेवल इसके लागू होने निर्भर करेगा। उनका कहना है कि राज्यों को सैलरी की नई परिभाषा के तहत न्यूनतम सैलरी के ढांचे का नोटिफिकेशन लाना होगा तो सिंगल रजिस्ट्रेशन, सिंगल लाइसेंस और सिंगल रिटर्न मैकेनिज्म जैसे यूनिफाइड सिस्टम के लिए स्टेट लेवल पर डिजिटल इंफ्रा को मजबूत बनाना जरूरी होगा।

वर्कप्लेस पर प्रक्रियाओं पर फोकस

इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड को लेकल बात करें तो पुनीत का कहना है कि मॉडल स्टैंडिंग ऑर्डर्स के नोटिफिकेशन से नियमों में शिकायतों के निपटारे के सिस्टम पर अधिक जोर दिया गया है। उनका कहना है कि एंप्लॉयीज के प्रकार, काम करने की परिस्थितियों, अटेंडेंस और छुट्टियों से जुड़े नियमों और अनुशासन से जुड़ी प्रक्रियाओं पर गाइ़डेंस दिया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि कई राज्यों में काम करने वाली कंपनियों पर इसका असर इस बात पर निर्भर करेगा कि केंद्रीय नियमों से राज्य के नियमों के कितने करीब हैं।

बढ़ेगा ग्रेच्यूटी और पीएफ का बेस!

चैंबर्स ऑफ भारत चुघ के पार्टनर एडवोकेट मयंक अरोड़ा का कहना है कि नए लेबर कोड्स के लागू करने के चरण में कंपनियों और एंप्लॉयीज को ऑपरेशनल और कानूनी तौर पर एडजस्टमेंट करना होगा। उनका कहना है कि नए फ्रेमवर्क के तहत वेतन की नई परिभाषा के तहत वेतन के ढांचे पर तत्काल असर डाल सकते हैं। मयंक के मुताबिक वेतन की नई परिभाषा के तहत ग्रेच्यूटी, पीएफ (प्रोविडेंट फंड) और सोशल सिक्योरिटी डिस्ट्रीब्यूशंस में बढ़ोतरी हो सकती है क्योंकि इनका बेस बढ़ेगा। इससे कंपनियों के लिए वेतन से जुड़ी लागत बढ़ सकती है। मयंक के मुताबिक यह लागू कैसे होता है, यह इस पर निर्भर करेगा कि नए नियमों के तहत कंपनियां वेतन के ढांचे और वर्कफोर्स मॉडल्स को कैसे अपनाती हैं।

सोशल सिक्योरिटी और इंडस्ट्रियल रिलेशंस

मयंक के मुताबिक इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड का उद्देश्य विवादों के निपटारे, स्थायी आदेश, हड़ताल, छंटनी और एंप्लॉयीज की संख्या में कमी की मंजूरी से जुड़ी प्रक्रियाओं को व्यवस्थित करना है। उनका यह भी कहना है कि इस कोड से गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को औपचारिक रूप से मान्यता मिल गई लेकिन इसका असर बात पर निर्भर करेगा कि योजनाओं को समय के साथ लागू किया जाता है। नए सिस्टम में ग्रेच्यूटी की गणना, ठेकेदार की देनदारी, मौजूदा सेटलमेंट्स और पहले के कानूनों के तहत अधिकारों के हस्तांतरण जैसी बातों को लेकर कानूनी परिभाषा में बदलाव आ सकता है।

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