लैब में बने हीरों से बदल रहा डायमंड मार्केट, धड़ल्ले से खरीद रहे लोग; जानिए वजह

डायमंड मार्केट में बड़ा बदलाव दिख रहा है। लैब में बने हीरे कम कीमत और नई टेक्नोलॉजी के कारण तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। आखिर लोग प्राकृतिक हीरों की जगह इन्हें क्यों चुन रहे हैं और इससे बाजार पर क्या असर पड़ेगा?

अपडेटेड Mar 17, 2026 पर 10:37 PM
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प्राकृतिक हीरों का बाजार भी करीब 5 से 10 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ सकता है।

दुनिया का डायमंड बाजार तेजी से बदल रहा है। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का कहना है कि पारंपरिक खदानों से निकलने वाले प्राकृतिक हीरों के साथ साथ अब लैब ग्रोन डायमंड भी तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं।

सी कृष्णैया चेट्टी ग्रुप के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर चैतन्य वी सी कोठा और मैनेजिंग डायरेक्टर सी विनोद हयग्रीव के मुताबिक उपभोक्ताओं की बदलती पसंद और सस्ती कीमतों के कारण बाजार का स्वरूप बदल रहा है।

लैब ग्रोन डायमंड से बढ़ी पहुंच


चैतन्य कोठा का कहना है कि लैब ग्रोन डायमंड ने डायमंड ज्वेलरी को ज्यादा लोगों तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई है। इससे ऐसे खरीदार भी इस बाजार में आए हैं, जो पहले प्राकृतिक हीरे नहीं खरीद पाते थे।

प्राकृतिक हीरे जमीन के अंदर लाखों साल में बनते हैं। वहीं लैब ग्रोन डायमंड नियंत्रित प्रयोगशाला माहौल में तैयार किए जाते हैं। हालांकि दोनों की रासायनिक संरचना और भौतिक गुण लगभग एक जैसे होते हैं।

कोठा के मुताबिक लैब ग्रोन डायमंड किसी तरह की दिक्कत नहीं हैं, बल्कि यह इस बात का नया रूप हैं कि 21वीं सदी में हीरे का मतलब क्या हो सकता है।

कीमत में बड़ा अंतर

लैब ग्रोन डायमंड की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण उनकी कीमत है। उदाहरण के तौर पर एक कैरेट का F-VVS प्राकृतिक हीरा करीब 7.5 लाख रुपये तक का हो सकता है।

वहीं उसी क्वालिटी का लैब ग्रोन हीरा करीब 45 हजार रुपये में मिल जाता है। इस बड़े अंतर की वजह से ज्यादा लोग डायमंड ज्वेलरी खरीद पा रहे हैं।

नई पीढ़ी की बदलती सोच

आज की युवा पीढ़ी खरीदारी करते समय सस्टेनेबिलिटी, ट्रेसबिलिटी और जिम्मेदार सोर्सिंग जैसे पहलुओं पर भी ध्यान दे रही है।

लैब में उत्पादन होने के कारण इन हीरों में क्वालिटी की एकरूपता ज्यादा रहती है और बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव होता है। इससे डिजाइन और कट में भी ज्यादा प्रयोग किए जा सकते हैं।

प्राकृतिक हीरे की अहमियत

हालांकि एक्सपर्ट्स का मानना है कि प्राकृतिक हीरे लग्जरी सेगमेंट में अपनी मजबूत जगह बनाए रखेंगे। उनकी दुर्लभता और प्राकृतिक उत्पत्ति उन्हें खास बनाती है।

सी विनोद हयग्रीव के मुताबिक- प्राकृतिक हीरों की मांग लंबे समय तक बनी रह सकती है। लेकिन इंडस्ट्री को पारदर्शिता और उपभोक्ताओं को सही जानकारी देने पर ज्यादा ध्यान देना होगा।

रूबी बाजार जैसा ट्रेंड

हयग्रीव ने इस ट्रेंड की तुलना रूबी बाजार से की। वहां प्राकृतिक और सिंथेटिक दोनों तरह के पत्थर साथ साथ बढ़े हैं, किसी ने दूसरे को पूरी तरह खत्म नहीं किया। दुनिया में प्राकृतिक रूबी का उत्पादन पिछले दशक में लगातार बढ़ा है।

2016 में इसका वैश्विक उत्पादन करीब 1.5 करोड़ कैरेट था। 2026 तक इसके 2.94 करोड़ कैरेट तक पहुंचने का अनुमान है। यानी 10 साल में उत्पादन में लगभग 95 से 110 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। इसकी सालाना वृद्धि दर करीब 5.1 से 5.9 प्रतिशत रही है।

सिंथेटिक रूबी में तेज वृद्धि

वहीं सिंथेटिक रूबी का उत्पादन इससे भी तेज गति से बढ़ा है। 2016 के बाद से इसमें लगभग 110 से 125 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। इसकी सालाना वृद्धि दर करीब 7.3 से 7.7 प्रतिशत रही है।

2016 में सिंथेटिक रूबी का बाजार हिस्सा बहुत छोटा था, लेकिन 2026 तक यह वैश्विक रूबी बाजार के करीब 39 प्रतिशत हिस्से तक पहुंच सकता है।

डायमंड बाजार का भविष्य

एक्सपर्ट्स का मानना है कि हीरों के बाजार में भी कुछ ऐसा ही मॉडल देखने को मिल सकता है। लैब ग्रोन डायमंड नए ग्राहकों को जोड़ेंगे, जबकि प्राकृतिक हीरे कलेक्टर और लक्जरी खरीदारों के बीच अपनी अलग पहचान बनाए रखेंगे।

हयग्रीव के मुताबिक अगले दशक में प्राकृतिक हीरों का बाजार भी करीब 5 से 10 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ सकता है। भविष्य में डायमंड इंडस्ट्री दो समानांतर हिस्सों में विकसित हो सकती है। एक हिस्सा दुर्लभता और विरासत पर आधारित होगा, जबकि दूसरा किफायती कीमत और तकनीकी इनोवेशन पर।

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