लोन की ईएमआई चुकाने में लापरवाही ठीक नहीं है। पहली ईएमआई नहीं चुकाने पर ज्यादातर बैंक और एनबीएफसी इसे ग्राहक की तरफ से पेमेंट में हुई देर मानते हैं। वे ग्राहक को रिमाइंडर भेजते हैं या कॉल करते हैं। लेट फीस भी लगाते हैं, जिसका अमाउंट लोन की वैल्यू के आधार पर कुछ सौ रुपये से लेकर कुछ हजार रुपये के बीच हो सकता है। अगर आप इसका पेमेंट एक महीने के अंदर कर देते हैं तो आपके क्रेडिट स्कोर पर बहुत मामूली या कोई असर नहीं पड़ता है। बैंक या एनबीएफसी अकाउंट को ओवरड्यू मार्क कर देते हैं। लेकिन, अकाउंट 'रेगुलर' कैटेगरी में बना रहता है।
60 दिन तक पेमेंट में देर पर कलेक्शन टीम की एंट्री
दूसरी EMI की पेमेंट मिस करने पर बैंक और एनबीएफसी की चिंता बढ़ जाती है। तब EMI पेमेंट में 60 देरी बढ़कर 60 दिन हो जाती है। बैंक और एनबीएफसी ग्राहक से संपर्क करने के लिए हर तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। अनसेक्योर्ड लोन यानी पर्सनल लोन या क्रेडिट कार्ड लोन के मामले में क्लेक्शन टीम की एंट्री हो सकती है। खास बात यह है कि बैंक या एनबीएफसी पेमेंट में देर की जानकारी क्रेडिट ब्यूरो को देते हैं। इसका ग्राहक के क्रेडिट स्कोर पर खराब असर पड़ता है। क्रेडिट स्कोर में बड़ी गिरावट आ जाती है।
90 दिन तक पेमेंट नहीं होने पर अकाउंट NPA हो जाता है
कार लोन या होम लोन के मामले में दो EMI पर ग्राहक डिफॉल्ट करने पर बैंक लीगल एक्शन शुरू करने से बचते हैं। लेकिन, ऐसी फाइल की मॉनिटरिंग बढ़ा दी जाती है। अगर EMI 90 दिन तक नहीं चुकाई जाती है तो RBI के नियमों के मुताबिक, लोन नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (NPA) की कैटेगरी में चला जाता है। इसके बाद बैंक या एनबीएफसी का रवैया सख्त हो जाता है। ग्राहक को नोटिस भेजा जाता है। सेक्योर्ड लोन के मामले में बैंक रिकवरी की प्रक्रिया शुरू कर देते हैं। गिरवी रखे एसेट्स के इस्तेमाल का हक उन्हें मिल जाता है।
ज्यादातर ग्राहक बैंक से बातचीत शुरू करने में देरी करते हैं
अगर लोन अनसेक्योर्ड है तो बैंक या एनबीएफसी आर्बिट्रेशन या सिविल रिकवरी की धमकी देते हैं। इस प्वाइंट पर ग्राहक के क्रेडिट स्कोर को बड़ा झटका लगता है। इस झटके से क्रेडिट स्कोर के उबरने में कई सालों का समय लग सकता है। इस बीच, बकाया अमाउंट पर इंटरेस्ट बढ़ना जारी रहता है। ऐसे मामलों में ग्राहक सबसे बड़ी गलती यह करते हैं कि वे बैंक या एनबीएफसी से इस बारे में बातचीत करने के लिए इंतजार करते हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि ऐसे मामलों में पहली EMI का पेमेंट मिस हो जाने पर ही ग्राहक को बैंक से बातचीत करनी चाहिए।
ग्राहक के खुद बैंक से संपर्क करने पर समस्या का समाधान हो जाात है
ग्राहक अगर खुद बैंक को EMI मिस होने की वजह बताता है तो इससे काफी फर्क पड़ता है। कई बार सैलरी आने में देर, मेडिकल इमर्जेंसी या किसी दूसरी वजह से EMI पर डिफॉल्ट हो जाता है। अगर ग्राहक इस बारे में बैंक से बात करता है तो बैंक उसकी मदद कर सकता है। वह EMI का अमाउंट कम कर सकता है, कुछ समय के लिए रीपेमेंट पर मॉरेटोरियम लगा सकता है। होम लोन के मामले में तो रीस्ट्रक्चरिंग की ज्यादा गुंजाइश होती है। बैंक ग्राहक को कुछ विकल्प ऑफर करते हैं।