Bhu-Aadhaar: अब जमीन का भी बनेगा ‘आधार कार्ड’, कोई नहीं हड़प सकेगा आपका भूखंड

Land-Aadhaar Link: अब आपके खाली प्लॉट, या जमीन का भी आधार कार्ड बनेगा। इस बजट में इसके लिए केंद्र सरकार ने घोषणा कर दी है। इस योजना के तहत आपकी जमीन को 14 अंकों का एक विशिष्ट संख्या नंबर मिलेगा। जिसे भू-आधार (ULPIN) के नाम से पहचाना जाता है

अपडेटेड Jul 28, 2024 पर 3:23 PM
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Land-Aadhaar Link: भू आधार को जमीन मालिक की पहचान के साथ जोड़ने से फ्रॉड घटेंगे। अब ऑनलाइन सब काम होंगे।

देश के नागरिकों के आधार कार्ड की तरह अब जमीनों को भी विशिष्ट पहचान मिलेगी। इसे भू आधार (Land Aadhar card) का नाम दिया गया है। जमीन रिकॉर्ड डिजिटाइजेशन के तहत आम बजट में इसे प्रस्तावित भी किया गया है। तीन साल में इसे लागू कर दिया जाएगा। ऐसे में अब आपकी जमीन का भी आधार कार्ड बन जाएगा। वैसे भी आधार कार्ड आने से देश में कई क्रांतिकारी बदलाव आए हैं। आज के समय आधार कार्ड की वजह से कई सरकारी योजनाओं का फायदा सीधे लाभार्थियों के खाते में पहुंच रहा है। इस कारण आधार कार्ड काफी जरूरी दस्तावेज बन गया है।

दरअसल, ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में भूमि सुधार को लेकर सरकार ने बजट 2024 में कई बड़े कदम उठाए हैं। इसके तहत ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि के लिए विशिष्ट पहचान संख्या या कहें भू-आधार का प्रस्ताव रखा गया है। इसके अलावा शहरी भूमि का भी डिजिटलीकरण का भी प्रस्ताव रखा गया है। सरकार अगले तीन सालों में इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए राज्य सरकार को वित्तीय सहायता प्रदान करेगी। भू-आधार से जमीन से जुड़े विवाद भी खत्म होंगे और मालिकाना हक भी स्पष्ट होगा।

जानिए क्या है भू आधार


भू-आधार के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में जितनी भी भूमि है। उसे 14 अंकों की विशिष्ट पहचान संख्या मिलेगी। इसे भू आधार (ULPIN) के नाम से पहचाना जाता है। इस प्रक्रिया में भूमि की पहचान संख्या के साथ उसका मानचित्रण, सर्वे, मालिकाना और किसानों का रजिस्ट्रेशन किया जाएगा। इससे कृषि लोन मिलने में आसानी हो जाएगी। इसके अलावा उनको दूसरी कृषि सुविधाएं भी आसानी से मिल सकेंगी। वहीं शहरी क्षेत्रों में जो जमीने हैं, उनके भूमि अभिलेखों (Records) को जीआईएस मैपिंग के साथ डिजिटल किया जाएगा।

ऐसे काम करता है भू-आधार

इसमें पहले जीपीएस तकनीक की मदद लेकर जमीन का जियोटैग किया जाता है। इसके बाद सर्वेक्षण करने वाले भूमि की सीमा का भौतिक सत्यापन और माप करते हैं। यह करने के बाद जो रिकॉर्ड एकत्रित किया जाता है। उसको भूमि रिकॉर्ड मैनेजमेंट सिस्टम में दाखिल किया जाता है। इसके बाद सिस्टम अपने आप भू-खंड के लिए 14 अंकों का भू-आधार संख्या तैयार करता है। यह भू-आधार संख्या डिजिटल रिकॉर्ड से जुड़ा होता है।

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