दिखावे पर न जाएं, अपनी अक्ल लगाएं! हॉलिडे और क्लब मेंबरशिप स्कीम्स आजकल ग्राहकों को बड़े सपने दिखाती हैं। कम कीमत में शानदार रिसॉर्ट, हर साल लंबी छुट्टियां और टेंशन-फ्री वेकेशन का वादा। लेकिन क्या हर ऐसा वादा सच में जमीन पर उतरता है? और अगर ग्राहक को सर्विस नहीं मिलती, तो क्या अदालत हमेशा उसके पक्ष में फैसला देती है? पंजाब के एक ग्राहक से जुड़ा यह मामला बताता है कि सिर्फ पैसे देना ही काफी नहीं होता, बल्कि शर्तें समझना और उनको मानना भी उतना जरूरी है। 60,000 रुपये खर्च करने के बावजूद छुट्टी न मिल पाने के इस मामले में राज्य ग्राहक आयोग ने ग्राहक के बजाय कंपनी के पक्ष में फैसला दिया। ये फैसला ग्राहकों के लिए सबह है कि सिर्फ बोले गए वादे पर न जाए, लिखित में जो शर्तें लिखी हैं। उसे समझकर ही साइन करें।
पंजाब के रहने वाले मिस्टर वोहरा ने एक रिज़ॉर्ट कंपनी की प्रेजेंटेशन देखने के बाद 60,000 रुपये में पांच साल का वेकेशन पैकेज खरीदा। कंपनी ने बड़े-बड़े वादे किए थे। हर साल 21 दिन की मुफ्त रहने और खाने की सुविधा, शानदार रिसॉर्ट्स और बेहतरीन हॉस्पिटैलिटी। 28 सितंबर 2018 को उन्हें क्लब मेंबरशिप भी मिल गई, जो 5 साल के लिए वैलिड थी।
लेकिन परेशानी तब शुरू हुई जब दिसंबर 2018 में मिस्टर वोहरा ने गोवा में छुट्टी बिताने के लिए बुकिंग कराने की कोशिश की। कंपनी ने यह कहकर मना कर दिया कि उस समय जगह नहीं है। इसके बाद जनवरी 2019 में उन्होंने बेंगलुरु, ऊटी समेत अन्य जगहों के लिए भी बुकिंग मांगी, लेकिन हर बार उनकी रिक्वेस्ट ठुकरा दी गई। उल्टा, कंपनी ने उनसे 10,000 रुपये एक्स्ट्रा जमा करने को कहा।
खुद को ठगा हुआ महसूस करते हुए मिस्टर वोहरा ने ग्राहक अदालत का रुख किया। उनका कहना था कि 60,000 रुपये लेने के बाद भी कंपनी ने एक भी छुट्टी बुक नहीं की, जिससे उनके परिवार की योजनाएं खराब हो गईं। उन्होंने आरोप लगाया कि कंपनी ने झूठे वादे कर ग्राहकओं को फंसाया।
कंपनी ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि मिस्टर वोहरा ने पैकेज की शर्तें ठीक से नहीं पढ़ीं। उनके मुताबिक, कुल पैकेज कीमत 70,000 रुपये थी, जबकि मिस्टर वोहरा ने केवल 60,000 रुपये ही दिए थे। यानी 10,000 रुपये बकाया था। इसके अलावा हर साल 10,500 रुपये का एनुअल मेंटेनेंस चार्ज (AMC) देना भी अनिवार्य था, जो उन्होंने कभी जमा नहीं किया। कंपनी ने यह भी कहा कि लिखित एग्रीमेंट और वेलकम लेटर में ये सभी शर्तें साफ तौर पर दर्ज थीं और मौखिक वादों से ऊपर लिखित समझौते को प्राथमिकता दी जाएगी।
मामला जब Punjab State Consumer Commission के पास पहुंचा, तो आयोग ने जिला ग्राहक आयोग के उस आदेश को पलट दिया, जिसमें पहले मिस्टर वोहरा को राहत दी गई थी। राज्य आयोग ने 13 नवंबर 2025 को फैसला सुनाते हुए कहा कि मिस्टर वोहरा ने यह महत्वपूर्ण तथ्य छुपाया कि उन्होंने पूरा पेमेंट नहीं किया था। एग्रीमेंट और वेलकम लेटर दोनों में साफ लिखा था कि छुट्टियों का लाभ लेने से पहले 10,000 रुपये की बाकी रकम और AMC चुकाना जरूरी है। मिस्टर वोहरा पेशे से वकील हैं, इसलिए यह माना जाएगा कि उन्होंने एग्रीमेंट की शर्तें समझकर ही उस पर साइन किए।