Rupee vs Dollar: मजबूती के साथ खुला रुपया, 95.22 पर पहुंचा, लेकिन महंगे कच्चे तेल ने रोकी रफ्तार
डॉलर इंडेक्स 101.70 पर फिसला और अमेरिकी 10 साल की बॉन्ड यील्ड 4.90% पर आ गई, जिससे रुपये को राहत मिली। पर कच्चे तेल में नई तेजी से भारत के इंपोर्ट बिल और डॉलर की मांग को लेकर चिंता बढ़ी है। जानिए रुपये की बढ़त क्यों सीमित रही और आगे इसकी चाल किन बातों पर टिकी है
30 अक्टूबर को रुपया डॉलर के मुकाबले 4 पैसे मजबूत होकर 95.22 पर खुला।
शुक्रवार को रुपया डॉलर के मुकाबले 95.22 पर खुला, जो पिछले बंद 95.26 से 4 पैसे मजबूत है। डॉलर इंडेक्स 101.70 पर फिसला और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड नीचे आई, जिससे रुपये को सहारा मिला। लेकिन Brent Crude $117.84 प्रति बैरल पर पहुंच गया है। भारत बड़ा तेल आयातक है, इसलिए महंगा तेल इंपोर्ट बिल और डॉलर की मांग दोनों बढ़ाता है। एक करेंसी ट्रेडर के मुताबिक तेल की तेजी इस राहत पर भारी पड़ सकती है।
भारतीय रुपया शुक्रवार, 30 अक्टूबर को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 4 पैसे की बढ़त के साथ 95.22 पर खुला। पिछले कारोबारी सत्र में रुपया 95.26 पर बंद हुआ था। डॉलर के पीछे हटने और अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में गिरावट से रुपये को सहारा मिला, लेकिन ये बढ़त बहुत छोटी रही। वजह है कच्चा तेल, जिसकी कीमतों में आई नई तेजी ने भारत के इंपोर्ट बिल और डॉलर की मांग को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
शुरुआती कारोबार में कितना मजबूत हुआ रुपया
शुक्रवार सुबह बाजार खुलते ही रुपया हल्की मजबूती के साथ 95.22 प्रति डॉलर पर दिखा। एक दिन पहले यही रुपया 95.26 पर बंद हुआ था। यानी एक डॉलर खरीदने के लिए अब पिछले बंद के मुकाबले 4 पैसे कम चुकाने पड़ रहे हैं।
4 पैसे सुनने में छोटा फर्क लगता है, और है भी। यही वजह है कि इसे मामूली बढ़त कहा जा रहा है। रुपये को इस वक्त दो उलटी दिशाओं से खिंचाव झेलना पड़ रहा है। एक तरफ कमजोर होता डॉलर उसे ऊपर खींच रहा है, तो दूसरी तरफ महंगा होता कच्चा तेल उसे नीचे दबा रहा है। सुबह की 4 पैसे की बढ़त इन्हीं दोनों ताकतों की खींचतान का नतीजा है।
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में गिरावट से मिला सहारा
रुपये को जो राहत मिली, उसकी जड़ अमेरिका के बॉन्ड बाजार में है। अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड नीचे आई, और इसका दबाव डॉलर पर पड़ा। दुनिया की बड़ी करेंसी के मुकाबले डॉलर की ताकत मापने वाला डॉलर इंडेक्स फिसलकर 101.70 पर आ गया।
यील्ड में ये गिरावट बॉन्ड बाजार में आई "फ्लाइट टू सेफ्टी" के बाद देखने को मिली। आसान शब्दों में, निवेशक जोखिम वाली जगहों से पैसा निकालकर सुरक्षित माने जाने वाले बॉन्ड में लगाने लगे। इस बार इसके पीछे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI में लगाए जा रहे भारी-भरकम निवेश पर मिलने वाले रिटर्न को लेकर फिर से उठी चिंता है। जब बॉन्ड खरीदने वाले बढ़ते हैं, तो उनकी यील्ड नीचे आती है।
आंकड़ों में देखें तो अमेरिका की 2 साल की ट्रेजरी यील्ड 8 बेसिस पॉइंट गिरकर 7 हफ्तों के सबसे निचले स्तर पर आ गई। वहीं 10 साल की यील्ड फिसलकर 4.90% पर पहुंच गई।
कमजोर डॉलर आमतौर पर रुपये समेत उभरते बाजारों की करेंसी के लिए अच्छी खबर होता है। डॉलर जब ढीला पड़ता है, तो इन करेंसी पर उसका दबाव घट जाता है। शुक्रवार सुबह रुपये की बढ़त के पीछे यही सहारा काम कर रहा था।
डॉलर और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड की गिरावट ने जितनी राहत दी, कच्चे तेल ने उस पर उतना ही पानी फेरने का काम किया। Brent Crude फ्यूचर्स चढ़कर $117.84 प्रति बैरल पर पहुंच गया। तेल की इस तेजी के पीछे सप्लाई रुकने का डर है। ये डर तब बढ़ा, जब यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब पर अपने हमले तेज कर दिए।
भारत के लिए ये सीधी चिंता की बात है, क्योंकि भारत कच्चे तेल का बड़ा आयातक है। इसे एक घर के बजट की तरह समझिए। अगर घर की सबसे बड़ी जरूरत का सामान अचानक महंगा हो जाए, तो महीने का खर्च बढ़ जाता है। ठीक वैसे ही, तेल महंगा होने से देश का इंपोर्ट बिल बढ़ता है। और चूंकि तेल का भुगतान डॉलर में होता है, इसलिए डॉलर की मांग भी बढ़ जाती है।
डॉलर की बढ़ती मांग रुपये पर दबाव डालती है। यही दबाव कमजोर डॉलर से मिल रहे सहारे के एक हिस्से को बेअसर कर रहा है। इसी वजह से रुपया शुक्रवार को सिर्फ 4 पैसे की बढ़त ही बना पाया।
करेंसी ट्रेडर की राय
एक प्राइवेट सेक्टर बैंक के करेंसी ट्रेडर के मुताबिक, अमेरिकी यील्ड में गिरावट से रुपये को मिलने वाला सहारा सीमित रह सकता है। ट्रेडर ने इसकी वजह बताई कि यील्ड में ये गिरावट मुख्य रूप से फ्लाइट टू सेफ्टी की वजह से आई है। ट्रेडर ने ये भी कहा कि तेल की कीमतों में आई उछाल इस राहत से भी ज्यादा असर डाल सकती है।
यानी रुपये के सामने तस्वीर ये है कि एक हाथ से उसे राहत मिल रही है, तो दूसरे हाथ से उसे वापस खींचा जा रहा है। और ट्रेडर की मानें तो खींचने वाला हाथ ज्यादा मजबूत साबित हो सकता है।
इस खींचतान में एक और खिलाड़ी की भूमिका अहम रहेगी। ट्रेडर के मुताबिक रुपये की चाल इस बात पर भी निर्भर करेगी कि भारतीय रिजर्व बैंक यानी RBI फॉरेन एक्सचेंज मार्केट में किस तरह दखल देता है।