Retirement Planning: बहुत से लोग अपनी 9 से 6 की नौकरी छोड़कर 50 साल की उम्र में आराम से रिटायर होना चाहते हैं। खासकर मिडिल क्लास, जो सिर्फ सैलरी पर निर्भर रहते हैं, उसके लिए जल्दी रिटायरमेंट एक सपना जैसा लगता है। लेकिन एक्सपर्ट्स कहते हैं कि अगर प्लानिंग सही हो, खर्चे कंट्रोल में हों और निवेश लगातार किया जाए, तो यह सपना पूरा हो सकता है।
जल्दी रिटायरमेंट के लिए सबसे जरूरी है फाइनेंशियल डिसिप्लिन, यानी कमाई का कुछ हिस्सा हर महीने बचाना और उसे सही जगह निवेश करना। इक्विटी यानी शेयर मार्केट, डेट फंड, गोल्ड-सिल्वर इन सभी में थोड़ा-थोड़ा निवेश करने से रिस्क भी कम होता है और कंपाउंडिंग का फायदा भी मिलता है। कंपाउंडिंग वो जादू है, जो समय के साथ पैसे को तेजी से बढ़ाता है।
आपके लिए कितना रिटायरमेंट फंड जरूरी है?
फाइनेंशियल एक्सपर्ट अजय कुमार यादव (CFPCM), ग्रुप सीईओ & सीआईओ, वाइज फिनसर्व के मुताबिक, 50 की उम्र में रिटायर होने का मतलब है कि आपका जमा पैसा कम से कम अगले 30–35 साल तक चलना चाहिए। इसलिए सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि आपको कितना बड़ा फंड चाहिए।
अपना सालाना खर्च 25 से 30 गुना कर दें। यानी मान लीजिए आपका सालाना खर्च 12 लाख रुपये है, तो आपको लगभग 3 से 3.6 करोड़ रुपये का रिटायरमेंट फंड चाहिए होगा। हम सब जानते हैं कि महंगाई समय के साथ बढ़ती जाती है। आज 100 रुपये में जितना सामान मिलता है, वो 5 साल बाद नहीं मिल पाएगा। यही महंगाई यानी इंफ्लेशन आपकी रिटायरमेंट प्लानिंग पर सबसे ज्यादा असर डालती है।
यादव बताते हैं कि यदि आपकी आज के महीने की लागत 1 लाख है, तो 6% इंफ्लेशन के हिसाब से 5 साल में यह 1.34 लाख हो जाएगी। यानी सालाना खर्च 16.1 लाख तक पहुंच जाएगा। ऐसे में आपका रिटायरमेंट फंड भी करीब 4 से 4.8 करोड़ होना चाहिए।
यादव कहते हैं कि लंबे समय में इक्विटी ही सबसे ज्यादा रिटर्न देती है। लेकिन सिर्फ इक्विटी पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। पोर्टफोलियो में फिक्स्ड-इनकम (FD, बॉन्ड आदि) भी होना चाहिए, ताकि जरूरत पड़ने पर नियमित और सेफ रिटर्न मिलता रहे। बाजार कभी-कभी कई साल तक भी फ्लैट रह सकता है या गिर सकता है। इसलिए अपनी प्लानिंग को हर स्थिति में टेस्ट करना जरूरी है। अगर रिटर्न कम मिले तो क्या होगा? अगर खर्च अचानक बढ़ जाए तो क्या करेंगे?
क्या जरूरी कदम उठाने चाहिए?
अपने रिटायरमेंट फंड में 10–15% का एक्स्ट्रा बफर रखें।
रिटायरमेंट के बाद सिस्टमैटिक विदड्रॉअल प्लान अपनाएं।
हर साल अपनी प्लानिंग का रिव्यू करें।
जरूरत हो तो खर्चे, पोर्टफोलियो और रिस्क लेवल में बदलाव करें।