Kaal Bhairav Jayanti 2025 Date: कल या परसों कब है काल भैरव जयंती, जानिए भैरव कथा और महत्व

Kaal Bhairav Jayanti 2025 Date: काल भैरव को भगवान शिव का उग्र रूप माना जाता है। अगहन मास के कष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को काल भैरव जयंति के रूप में जाना जाता है। इसे कालाष्टमी या भैरव अष्टमी भी कहते हैं। इस दिन काल भैरव की पूजा करने से नकारात्मक शक्तियों से छुटकारा मिलता है।

अपडेटेड Nov 10, 2025 पर 10:53 AM
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काल भैरव जयंती के दिन सुबह स्नान कर भगवान शिव और भैरव जी का पूजा करें। काल

Kaal Bhairav Jayanti 2025 Date: काल भैरव जयंति हर साल अगहन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाती है। काशी के कोतवाल कहे जाने वाले काल भैरव भगवान शिव का ही रौद्र रूप हैं। इनकी पूजा करने से नकारात्मक शक्तियों, अकाल मृत्यु का भय और दोष से छुटकारा मिलता है। काल भैरव जयंति को कालाष्टमी या भैरव अष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। इस साल कालाष्टमी का व्रत और पूजा 12 नवंबर को किया जाएगा। आइए जानें इनकी पूजा का मुहूर्त, कथा और महत्व।

भगवान काल भैरव समय, मृत्यु और न्याय के देवता माने जाते हैं, जो अपने भक्तों को भय, असुरक्षा, और पापों से मुक्ति दिलाते हैं। पचांग के अनुसार, इस साल काल भैरव जयंती 12 नवंबर 2025 बुधवार को पड़ रही है। अष्टमी तिथि 11 नवंबर सुबह 11:08 बजे शुरू होगी और 12 नवंबर को सुबह 10:58 पर खत्म हो जाएगी। उदयाथिति को देखते हुए 12 नवंबर 2025 को ही काल भैरव की जयंती मनाई जाएगी।

काल भैरव की पूजा विधि

काल भैरव जयंती के दिन सुबह स्नान कर भगवान शिव और भैरव जी का पूजा करें। काल भैरव की पूजा मंदिर में जाकर करनी चाहिए। मंदिर में सबसे पहले काल भैरव का गंगाजल से अभिषेक करें। फिर फल, फूल, धूप, दीप, मिठाई, पान, सुपारी आदि जैसी सामग्रिया अर्पित करने के बाद धूप-दीप जलाएं। काल भैरव को इस दिन इमरती या जलेबी का भोग जरूर लगाएं। इस दिन कुत्तों को भोजन कराना और दान देना अत्यंत शुभ माना जाता है क्योंकि कुत्ता भगवान भैरव का वाहन है। पूजा के बाद कुत्तों को भोजन जरूर कराएं। इससे भगवान काल भैरव का आशीर्वाद मिलता है।

काल भैरव को क्यों कहते हैं काशी का कोतवाल

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार ब्रह्मा, विष्णु और महेश के बीच इस बात को लेकर विवाद हुआ कि ब्रह्मांड का सर्वोच्च देव कौन है? इसके समाधान के लिए सभी देवताओं को बुलाकर उनकी राय ली गई। अधिकतर देवताओं ने शिव और विष्णु को श्रेष्ठ बताया, जिस पर ब्रह्मा जी नाराज हो गए और उन्होंने शिवजी को अपशब्द कहकर उनका अपमान किया।


इस पर भगवान शिव क्रोधिक हो गए और उनके क्रोध से ही काल भैरव प्रकट हुए। जिस दिन यह घटना हुई उस दिन मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि थी। इसलिए हर साल इस तिथि पर काल भैरव की जयंती मनाई जाती है। काल भैरव ने ब्रह्मा के पांचवें सिर को काट दिया। हालांकि, यह कार्य उन्होंने अहंकार का नाश करने के लिए किया। इस घटना के बाद काल भैरव ने ब्रह्मा के अपराध के प्रायश्चित के रूप में काशी नगरी में जाकर तप किया और तभी से उन्हें काशी का कोतवाल (रक्षक) कहा जाने लगा।

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