Saphala Ekadashi 2025 Vrat Katha: इस चमत्कारी कथा के बिना अधूरा है सफला एकादशी का व्रत, आज जरूर सुनें ये कथा

Saphala Ekadashi 2025 Vrat Katha: पौष माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि पर सफला एकादशी का व्रत किया जाता है। आज सफला एकादशी का व्रत करने से जीवन के मुश्किल कार्यों में सफलता का मार्ग स्पष्ट होता है। आज के दिन राजा महिष्मान और उनके बेटे लुंपक की कथा जरूर कहनी या सुननी चाहिए।

अपडेटेड Dec 15, 2025 पर 11:33 AM
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राजा महिष्मान और उनके पुत्र लुंपक की कथा में एकादशी व्रत का पुण्य प्रभाव बताया गया है।

Saphala Ekadashi 2025 Vrat Katha: आज पौष माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि है। आज के दिन पूरी श्रद्धा और सच्चे मन से भगवान विष्णु की पूजा करने से जीवन के हर काम में सफलता प्राप्त होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आज के दिन व्रत और दान से एक हजार अश्वमेध यज्ञ के बराबर पुण्य फल की प्राप्ति होती है। सफला एकादशी के दिन राजा महिष्मान और उनके पुत्र लुंपक की कथा सुनने या कहने का भी बहुत महत्व है। इस कथा में एकादशी व्रत का पुण्य प्रभाव बताया गया है। आइए जानें इस कथा का महत्व और कथा

कथा पाठ का धार्मिक महत्व

सफला एकादशी का व्रत रखने से पिछले सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। साथ ही जीवन के हर कष्ट और संकट से मुक्ति मिलती है और अंत में मोक्ष मिलता है। साथ ही श्री हरि की कृपा मिलती है।

राजा महिष्मान की कथा

चंपावती नाम की एक नगरी थी, जिस पर महिष्मान नामक एक राजा राज्य करता था। राजा के पांच पुत्र थे, जिनमें से सबसे बड़ा पुत्र लुंपक बेहद दुष्ट, पापी और बुरे कर्म करने वाला था। वह हमेशा देवताओं और ब्राह्मणों की निंदा करता था। अपने पुत्र के ऐसे कर्मों को देखकर राजा ने लुंपक को राज्य से बाहर निकाल दिया। लुंपक बहुत दिनों तक जंगल में दर-दर भटकता रहा। उसने खाने के लिए चोरी करना शुरू कर दिया। एक बार पौष महीने की कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि की रात उसे ठंडी के कारण नींद नहीं आई। वह पूरी रात जागता रहा। अगली सुबह तक वह भूख और ठंड से बेहोश हो चुका था।

जब उसे होश आया, तो उसने सोचा कि वह केवल फल खाकर अपनी भूख मिटाएगा। उसने जंगल से फल तोड़े और एक पीपल के पेड़ के नीचे भगवान विष्णु का नाम लेकर उन्हें फल अर्पित किए। अनजाने में ही उसने सफला एकादशी का उपवास और रात्रि जागरण पूरा कर लिया था। इस अनजाने में किए गए व्रत के प्रभाव से भगवान विष्णु बहुत प्रसन्न हुए, जिसके शुभ प्रभाव से अगली सुबह लुम्पक को एक दिव्य घोड़ा और सुंदर वस्त्र मिले। आकाशवाणी हुई, "हे लुंपक! यह सब सफला एकादशी के व्रत का फल है। अब तुम अपने पिता के पास जाओ और राज्य संभालो।"


लुंपक ने तुरंत अपने पिता के पास जाकर क्षमा मांगी और उन्हें सारी बात बताई। राजा महिष्मान ने प्रसन्न होकर लुंपक को राज्य सौंप दिया। लुंपक ने श्रद्धापूर्वक राजपाट संभाला और धर्म-कर्म करने लगा। अंत में, सफला एकादशी के प्रभाव से उसे विष्णु लोक में स्थान मिला।

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