Shattila Ekadashi 2026 Vrat Katha: इस साल षटतिला एकादशी का व्रत 14 जनवरी को किया जाएगा। षटतिला एकादशी का व्रत करने से सभी पाप नष्ट होते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है। माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को षटतिला एकादशी कहते हैं। इसमें तिल के 6 तरीकों से इस्तेमाल करने का विशेष महत्व है। इस दिन तिल का उबटन लगाते हैं, तिल नहाने के पानी में डालकर स्नान करते हैं, तिल का सेवन करते हैं, तिल से सूर्य को अर्घ्य देते हैं, तिल का दान देते हैं और भगवान विष्णु को तिल का भोग लगाते हैं। इस बार 23 साल बाद षटतिला एकादशी और मकर संक्रांति का दुर्लभ संयोग बन रहा है। साथ ही इस दिन 3 शुभ योग अमृत सिद्धि योग, सर्वार्थ सिद्धि योग और वृद्धि योग का भी निर्माण हो रहा है। इन योगों में एकादशी व्रत बहुत शुभ फलदायी है। षटतिला एकादशी पर भगवान विष्णु की व्रत कथा सुनना बहुत जरूरी है। इसके बिना व्रत पूरा नहीं माना जाता है। आइए जानें षटतिला एकादशी की व्रत कथा, मुहूर्त और पारण के बारे में।
षटतिला एकादशी मुहूर्त और पारण समय
माघ कृष्ण एकादशी तिथि का प्रारंभ : 13 जनवरी, दोपहर 3:17 बजे से
अमृत सिद्धि योग : सुबह 07:15 बजे से 15 जनवरी को प्रात:काल 03:03 बजे तक
सर्वार्थ सिद्धि योग : सुबह 07:15 बजे से 15 जनवरी को प्रात:काल 03:03 बजे तक
वृद्धि योग : शाम 07:56 बजे से अगले दिन सुबह तक
विष्णु पूजा का समय : सुबह 07:15 बजे से सुबह 09:53 बजे तक
षट्तिला एकादशी पारण समय : 15 जनवरी, सुबह 07:15 बजे से सुबह 09:21 बजे के बीच
एक बार नारद जी के निवेदन पर श्रीहरि विष्णु ने उनको षटतिला एकादशी की कथा भी सुनाई थी और उन्हें इस व्रत के महत्व और विधि के बारे में बताया था।
पृथ्वी लोक पर एक नगर में ब्राह्मण पति और पत्नी रहते थे। एक दिन पति की मृत्यु हो गई। इसके बाद विधवा ब्राह्मणी हर माह की एकादशी का व्रत रखती और विष्णु पूजा करती थी। उसकी भक्ति से भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और उन्होंने उस विधवा ब्राह्मणी की परीक्षा लेने की सोची। उन्होंने एक साधु का स्वरूप धारण किया और वे उस विधवा ब्राह्मणी के घर पहुंच गए। उस विधवा ब्राह्मणी ने उनको कुछ दान नहीं दिया और मिट्टी का एक पिंड देकर विदा कर दिया। उस पिंड को लेकर भगवान विष्णु अपने धाम वापस लौट आए।
समय व्यतीत होने लगा और एक दिन उस विधवा ब्राह्मणी का निधन हो गया। एकादशी व्रत और विष्णु पूजा करने की वजह से उसे बैकुंठ में जगह मिली। उस स्थान पर उसे रहने के लिए एक झोपड़ी मिली और वहां पर आम का एक पेड़ था, लेकिन वह झोपड़ी पूरी खाली थी। यह देखकर विधवा ब्राह्मणी ने भगवन विष्णु से पूछा कि पूरे जीवन एकादशी व्रत और आपकी पूछा का क्या लाभ हुआ? मृत्यु के बाद बैकुंठ में स्थान मिला, लेकिन खाली झोपड़ी प्राप्त हुई है।
तब भगवन विष्णु ने उससे कहा कि तुमने व्रत और पूजा की, लेकिन जीवन में कभी भी अन्न का दान नहीं दिया। अब तुमने अपने व्रत और पूजा से अर्जित पुण्य के दम पर रहने का स्थान प्राप्त कर लिया, लेकिन भोजन के लिए अन्न नहीं मिला। तब उसने श्रीहरि से उपाय जानना चाहा। इस पर श्रीहरि ने कहा कि जब देव कन्याओं से षटतिला एकादशी की विधि और महत्व के बारे में पता करना।
एक दिन उस विधवा ब्राह्मणी के पास देव कन्याएं आईं। तब ब्राह्मणी ने उनसे षटतिला एकादशी की व्रत विधि के बारे में पूछा। उन्होंने षटतिला एकादशी के महत्व और विधि के बारे में बताया। जब षटतिला एकादशी आई तो उसने बताए अनुसार व्रत रखा और विष्णु पूजा की और रात्रि जागरण किया। अगले दिन सुबह जब वह उठी तो देखा कि उसकी झोपड़ी धन और धान्य से भर गई है। जो लोग षटतिला एकादशी का व्रत रखते हैं, उनको इस दिन अन्न का दान जरूर करना चाहिए।