Vat Savitri Vrat 2025: आज वट सावित्री व्रत, जानें शुभ मुहूर्त, खास योग और पूजा विधि

Vat Savitri Vrat 2025: वट सावित्री व्रत में सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सुखमय वैवाहिक जीवन की कामना से निर्जला व्रत रखती हैं और वट वृक्ष की पूजा करती हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस वृक्ष में त्रिदेव – ब्रह्मा, विष्णु और महेश – का वास होता है, जिससे यह अत्यंत पावन माना जाता है

अपडेटेड May 26, 2025 पर 9:43 AM
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Vat Savitri Vrat 2025: बरगद वृक्ष को हिंदू धर्म में देव वृक्ष माना गया है।

वट सावित्री व्रत हिंदू संस्कृति का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो विशेष रूप से विवाहित महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी उम्र, उत्तम स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखा जाता है। ये व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को किया जाता है। वर्ष 2025 में ये पावन दिन 26 मई, सोमवार यानी आज पड़ रहा है, जो इसे और भी शुभ बना रहा है क्योंकि सोमवार के दिन अमावस्या का योग अत्यंत दुर्लभ माना जाता है। व्रत का धार्मिक महत्व करवा चौथ जितना ही माना जाता है।

इस दिन महिलाएं निर्जला उपवास रखती हैं और वट वृक्ष की पूजा कर सावित्री-सत्यवान की कथा सुनती हैं। 26 मई को अमावस्या दोपहर 12:11 बजे से शुरू होकर 27 मई सुबह 8:31 बजे तक रहेगी। ये व्रत नारी शक्ति, समर्पण और पति-पत्नी के पवित्र रिश्ते की अद्भुत मिसाल है।

महत्व और शुभ मुहूर्त


व्रत के दूसरे दिन भरणी नक्षत्र, शोभन योग और अतिगण्ड योग का शुभ मेल बना है। सुबह 11:54 से दोपहर 12:42 तक का अभिजीत मुहूर्त पूजा और व्रत के लिए अत्यंत फलदायक माना जाता है। खास बात ये है कि इस बार वित्री सोमवती अमावस्या के साथ आ रही है, जो बेहद दुर्लभ और शुभ मानी जाती है। साथ ही चंद्रमा वृषभ राशि में होने के कारण भी ये दिन और प्रभावशाली है।

वट सावित्री व्रत की पूजा विधि

पूजा के लिए बरगद के पेड़ के नीचे सावित्री, सत्यवान और यमराज की मूर्ति या तस्वीर रखकर जल, फूल, धूप, मिठाई आदि से पूजा की जाती है। कच्चा सूत लेकर पेड़ की परिक्रमा करते हुए सूत को पेड़ के तने में बांधते हैं और सात बार चक्कर लगाते हैं। इसके बाद भीगा हुआ काला चना लेकर सावित्री सत्यवान की कथा सुनते हैं। पूजा के अंत में भीगे चने, वस्त्र और कुछ धन अपनी सास को देकर उनका आशीर्वाद लेते हैं। अंत में वट वृक्ष की कोपल खाकर व्रत पूरा किया जाता है।

वट सावित्री व्रत कथा

आज का दिन सभी सुहागिन महिलाओं के लिए बेहद पावन और खास माना जाता है, क्योंकि इस दिन वट सावित्री व्रत रखा जाता है। इस व्रत से पति की लंबी उम्र और उत्तम स्वास्थ्य का आशीर्वाद मिलता है। एक मान्यता के अनुसार, मद्रदेश के राजा अश्वपति के कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति की कामना से उन्होंने यज्ञ और पूजा-पाठ किए, जिसके फलस्वरूप उन्हें एक कन्या प्राप्त हुई जिसका नाम सावित्री रखा गया। जब सावित्री विवाह योग्य हुई, तब उसकी शादी द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान से तय हुई। सत्यवान के पिता एक समय में राजा थे, लेकिन राजपाट छिन जाने के बाद वे जंगल में गरीबी में जीवन व्यतीत करने लगे। साथ ही, दोनों की दृष्टि भी चली गई थी। वे लकड़ियां काटकर जीवन चलाते थे। जब सावित्री-सत्यवान के विवाह की बात चली, तो नारद मुनि ने सावित्री के पिता को चेताया कि सत्यवान अल्पायु हैं, परंतु सावित्री ने उन्हें ही पति रूप में स्वीकार किया।

वट वृक्ष का पवित्र महत्व

बरगद वृक्ष को हिंदू धर्म में देव वृक्ष माना गया है। कहा जाता है कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश और सावित्री इसी पेड़ में वास करते हैं। तुलसीदास ने इसे तीर्थराज का छत्र कहा है। ये वृक्ष न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि ये पर्यावरण के लिए भी अत्यंत लाभकारी है। इसकी दीर्घायु और शक्ति के कारण इसे लंबी आयु और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इसलिए इस दिन बरगद की पूजा विशेष श्रद्धा से की जाती है।

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