भारत में नौकरी करने वाले लोगों के लिए असली थकान सिर्फ काम से नहीं, बल्कि रोजाना के लंबे और मुश्किल सफर से आती है। खासकर गर्मियों में जब तापमान चरम पर होता है, तब ऑफिस आना-जाना किसी चुनौती से कम नहीं लगता। भीड़भाड़, ट्रैफिक, पसीना और समय की बर्बादी—ये सब मिलकर दिन की शुरुआत को ही थका देने वाला बना देते हैं। ऐसे में कई लोग ऑफिस पहुंचने से पहले ही अपनी आधी ऊर्जा खो देते हैं। इसी समस्या को उजागर करते हुए लिंक्डइन यूजर सुहिता देव ने पारंपरिक ऑफिस कल्चर पर सवाल उठाया है।
उनका मानना है कि बदलते समय के साथ काम करने के तरीकों में भी बदलाव जरूरी है। उन्होंने इस बात पर चर्चा शुरू की है कि क्या आज के दौर में रोजाना ऑफिस जाना वाकई जरूरी है, या फिर कंपनियों को कर्मचारियों की सुविधा और वास्तविक परिस्थितियों को समझते हुए नए विकल्पों पर विचार करना चाहिए।
8 घंटे की नौकरी या 10 घंटे की मजबूरी?
सुहिता का कहना है कि ऑफिस सिर्फ 8-9 घंटे की शिफ्ट तक सीमित नहीं है। इसमें रोजाना 1-2 घंटे का सफर भी जुड़ जाता है, जो कर्मचारियों की ऊर्जा और समय दोनों को खा जाता है। यानी असल में नौकरी का समय और भी लंबा हो जाता है।
गर्मी में ‘ऑफिस पहुंचना’ एक जंग जैसा
उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि कई लोग तेज धूप में 30-40 मिनट तक बस या ऑटो के इंतजार में खड़े रहते हैं। 45 डिग्री की गर्मी में सफर करना, किराए को लेकर मोलभाव करना और फिर पसीने से तर-बतर होकर ऑफिस पहुंचना—ये रोज की हकीकत बन चुकी है।
सैलरी का हिस्सा भी निगल रहा है सफर
सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि कई कर्मचारियों की कमाई का लगभग 15% हिस्सा सिर्फ ऑफिस आने-जाने में खर्च हो जाता है। यानी जिस नौकरी से कमाई हो रही है, उसी तक पहुंचना भी महंगा पड़ रहा है।
रिमोट वर्क ने दिखाया दूसरा रास्ता
सुहिता ने ये भी याद दिलाया कि कोविड के दौरान कंपनियां बिना ऑफिस के भी सफलतापूर्वक चलती रहीं। सीमित संसाधनों और घर से काम के बावजूद टीमों ने अच्छा प्रदर्शन किया और समय पर काम पूरा किया।
ऑफिस जरूरी है, लेकिन सोच बदलने की जरूरत
वो मानती हैं कि ऑफिस का अपना महत्व है, टीमवर्क और आमने-सामने बातचीत जरूरी है। लेकिन अब समय आ गया है कि कंपनियां ट्रांसपोर्ट सपोर्ट, फ्लेक्सिबल टाइमिंग या हाइब्रिड वर्क जैसे विकल्पों पर गंभीरता से विचार करें।
असली मुद्दा ‘ट्रस्ट’ तो नहीं?
चर्चा के दौरान एक यूजर ने सवाल उठाया कि क्या यह भरोसे की कमी का मामला है? इस पर सुहिता ने साफ कहा कि हां, यह एक फैक्टर हो सकता है। अगर प्रोडक्टिविटी ही मुद्दा होता, तो वर्क फ्रॉम होम के आंकड़े सब साबित कर चुके हैं।
बड़े शहरों की सबसे बड़ी परेशानी
कई यूजर्स ने भी इस बात से सहमति जताई कि मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहरों में असली तनाव काम से ज्यादा ट्रैफिक और सफर से आता है। रोजाना का यह संघर्ष कर्मचारियों की जिंदगी को मुश्किल बना रहा है।