दुनिया के अलग-अलग समाजों में सुंदरता की परिभाषा भी अलग होती है। जहां अधिकतर जगहों पर पतले और फिट शरीर को आकर्षक माना जाता है, वहीं इथियोपिया की एक जनजाति इस धारणा को पूरी तरह बदल देती है। यहां मोटा और भारी शरीर न सिर्फ खूबसूरती का प्रतीक है, बल्कि ताकत, समृद्धि और सामाजिक सम्मान से भी जुड़ा हुआ है। इस अनोखी सोच के पीछे एक दिलचस्प परंपरा है, जो हर साल पूरे समुदाय को एक साथ लाती है।
इस खास आयोजन में युवा पुरुष हिस्सा लेते हैं और खुद को अलग तरीके से तैयार करते हैं। ये परंपरा सिर्फ एक प्रतियोगिता नहीं, बल्कि उनकी संस्कृति और पहचान का अहम हिस्सा है, जो पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी लोगों को आकर्षित करती है।
इस जनजाति में हर साल “का'एल” नाम का एक खास समारोह आयोजित होता है। ये सिर्फ एक उत्सव नहीं, बल्कि एक अनोखी प्रतियोगिता होती है, जिसमें युवा पुरुष हिस्सा लेते हैं। हर परिवार अपने एक अविवाहित युवक को चुनता है, जो इस चुनौती के लिए तैयार होता है।
चयनित युवक लगभग 6 महीने तक खुद को इस प्रतियोगिता के लिए तैयार करता है। इस दौरान वो ज्यादातर समय अपनी झोपड़ी में ही रहता है और शारीरिक गतिविधियों से दूरी बनाता है। उसका मुख्य आहार दूध और पशुओं का खून होता है, जिससे उसका वजन तेजी से बढ़ सके।
परंपरा में छिपा प्रकृति के प्रति सम्मान
इस प्रक्रिया की खास बात ये है कि जानवरों को नुकसान नहीं पहुंचाया जाता। उनसे थोड़ी मात्रा में खून लिया जाता है और फिर उनकी देखभाल की जाती है, क्योंकि उन्हें पवित्र माना जाता है। ये परंपरा प्रकृति और जीवों के प्रति सम्मान को भी दर्शाती है।
इस प्रतियोगिता के दौरान गांव के लोग इन युवकों का विशेष ध्यान रखते हैं। ये सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि पूरे समुदाय का गौरव बन जाता है। सभी लोग इस आयोजन को एक त्योहार की तरह मनाते हैं।
सबसे भारी शरीर वाला बनता है “हीरो”
छह महीने बाद जब समारोह होता है, तो प्रतिभागी अपने शरीर पर मिट्टी और राख लगाकर मंच पर आते हैं। अंत में सबसे ज्यादा मोटे और भारी शरीर वाले युवक को विजेता घोषित किया जाता है। भले ही उसे कोई इनाम नहीं मिलता, लेकिन समाज में उसे जीवनभर के लिए सम्मान और पहचान मिलती है।
इस जनजाति की महिलाओं के लिए मोटा शरीर सिर्फ आकर्षण नहीं, बल्कि ताकत, समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य का संकेत होता है। इसलिए वे ऐसे पुरुषों को ज्यादा पसंद करती हैं।
बदलते समय के साथ परंपरा पर खतरा
हालांकि, आधुनिकता और बदलती जीवनशैली के चलते यह परंपरा धीरे-धीरे खत्म होने की कगार पर है। फिर भी, यह हमें यह सिखाती है कि सुंदरता का पैमाना हर संस्कृति में अलग होता है और इसे एक नजरिए से नहीं आंका जा सकता।