Indian Sweets: क्या आपने भी खाई हैं ये मिठाइयां? फ्यूजन के शौक में विलुप्त हो रही है पारंपरिक मिठाइयां!

आज के दौर में नए और फ्यूजन मिठाइयों ने भारतीय स्वाद को नया रूप दे दिया है, लेकिन इस बीच हमारे देश की कुछ प्राचीन और पारंपरिक मिठाइयां धीरे-धीरे हमारी याद से खिसकती जा रही हैं। ये मिठाइयां सिर्फ स्वाद नहीं हैं, बल्कि हमारी संस्कृति, त्योहारों और रीति-रिवाजों की भी गवाह हैं।

अपडेटेड Aug 05, 2025 पर 16:48
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आज के दौर में नए और फ्यूजन मिठाइयों ने भारतीय स्वाद को नया रूप दे दिया है, लेकिन इस बीच हमारे देश की कुछ प्राचीन और पारंपरिक मिठाइयां धीरे-धीरे हमारी याद से खिसकती जा रही हैं। ये मिठाइयां सिर्फ स्वाद नहीं हैं, बल्कि हमारी संस्कृति, त्योहारों और रीति-रिवाजों की भी गवाह हैं।

सिताभोग (पश्चिम बंगाल)
पहली नजर में यह पुलाव जैसा लग सकता है, लेकिन सिताभोग एक मीठी डिश है जो चावल के आटे के साथ वर्मिसेली, पनीर और चीनी से बनता है। इसका इतिहास 1904 से जुड़ा है और इसे कभी राजा मुगलों को भी परोसा जाता था। आज यह मिठाई ज्यादातर पश्चिम बंगाल तक ही सीमित है।

मलाई घेवर (राजस्थान)
राजस्थानी त्योहार तीज में प्रसिद्ध घेवर की क्रीमी वैराइटी ‘मलाई घेवर’ अब धीरे-धीरे गायब हो रही है। केसर और पिस्ता से सजाया जाने वाला यह घेवर आज के वक्त में कम मिलता है क्योंकि इसे बनाने में मेहनत ज्यादा लगती है।

पूठलेकुलु (आंध्र प्रदेश)
कागज जितनी पतली और नाजुक, इस मिठाई को ‘कोटेड शीट्स’ भी कहा जाता है। इसे चावल के स्टार्च से बनाया जाता है और गुड़ या मीठे सूखे मेवे भरकर फोल्ड किया जाता है। कुम्हारों के परिवारों में इसे अभी भी बनाया जाता है लेकिन युवाओं में यह कला खत्म होती जा रही है।

अधिरसम (तमिलनाडु)
यह मीठा पकवान गुटका और गुड़ से बनता है। 16वीं सदी से यह मंदिरों में भोग के रूप में और घरों में त्योहारों पर बनाया जाता रहा है। इसे बनाना मेहनत वाला काम है, इसलिए अब यह ज्यादा घरों में नहीं बनता।

खाजा (ओडिशा / बिहार)
पतला, कुरकुरा और चाशनी में डूबा हुआ, खाजा कभी पुरी के मंदिरों और शादियों में अत्यंत महत्वपूर्ण था। अब यह मिठाई मेले या सड़क किनारे मिलती है और धीरे-धीरे यादों में समा रही है।

माखन बड़ा (बिहार)
यह डोनट के जैसा गोल और क्रिस्पी मिठाई अपना खास स्वाद रखता है। कभी बिहार और यूपी में खास मौके पर बनता था, आज ट्रेंडी और हल्की मिठाइयों के चलते इसकी मांग कम हो गई है।

परवल की मिठाई (उत्तर प्रदेश/बिहार)
अजीब लग सकती है परवल जब मिठाई में इस्तेमाल हो, लेकिन यह खोया और सूखे मेवे से भरकर बनाई जाती है। शादी और त्योहारों में बनती रही यह मिठाई अब काफी हद तक भूली गई है।

धारवाड़ पेड़ा (कर्नाटक)
175 साल पुरानी यह मिठाई मलाईदार और मलाई जैसी बनावट वाली होती है। कर्नाटक के कुछ हिस्सों में अभी भी मिलती है, लेकिन इसका व्यापक परिचय नहीं हो सका।

ये मिठाइयां सिर्फ स्वादिष्ट ही नहीं, हमारी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा भी हैं। हर मिठाई में त्योहारों, परिवार और रिवाजों की गंध छुपी होती है। आज के तेज-तर्रार जमाने में जहां फास्ट और ग्लॉसी डिजाइनों वाली मिठाइयां छाई हैं, वहां इन पारंपरिक मिठाइयों को बचाना और इन्हें फिर से हमारी मेज पर वापस लाना बेहद महत्वपूर्ण है।

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