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अब QR कोड के साथ बिकेगी कोल्हापुरी चप्पल, स्कैन करने पर मिलेंगी दिलचस्प डिटेल; प्राडा कांड के बाद ऑथेंटिसिटी पर बढ़ा जोर

12वीं शताब्दी से चली आ रही यह चप्पल मुख्य रूप से महाराष्ट्र के कोल्हापुर, सांगली और सोलापुर जिलों में तैयार की जाती रही है। महाराष्ट्र और कर्नाटक सरकारों ने संयुक्त रूप से 2019 में कोल्हापुरी चप्पल के लिए जियोग्राफिकल इंडीकेशन टैग हासिल किया

Edited By: Ritika Singhअपडेटेड Jul 27, 2025 पर 2:53 PM
अब QR कोड के साथ बिकेगी कोल्हापुरी चप्पल, स्कैन करने पर मिलेंगी दिलचस्प डिटेल; प्राडा कांड के बाद ऑथेंटिसिटी पर बढ़ा जोर
कोल्हापुरी चप्पल अपनी जटिल कारीगरी और सांस्कृतिक विरासत के लिए प्रसिद्ध है।

भारत के सबसे प्रतिष्ठित पारंपरिक शिल्प यानि ट्रेडिशनल क्राफ्ट में से एक कोल्हापुरी चप्पल न केवल घरेलू फैशन जगत में बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी नए सिरे से लोकप्रिय हो रही है। अपनी जटिल कारीगरी और सांस्कृतिक विरासत के लिए प्रसिद्ध इस प्रोडक्ट को अब QR कोड के साथ बेचा जाएगा ताकि नकली प्रोडक्ट्स पर रोक लगाई जा सके। कोल्हापुरी चप्पल को भौगोलिक संकेतक यानि GI (Geographical Indication) टैग मिला हुआ है। GI टैग ऐसे प्रोडक्ट्स को मिलता है, जो ओरिजिनली किसी खास जगह या चुनिंदा जगहों पर भी बनते हैं और उस जगह की पहचान होते हैं।

न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, QR कोड वाले फैसले पर महाराष्ट्र के चमड़ा उद्योग विकास निगम (लिडकॉम) के अधिकारियों ने बताया कि इस कदम का उद्देश्य नकली कोल्हापुरी चप्पल की बिक्री पर रोक लगाना, प्रत्येक प्रोडक्ट के पीछे कारीगर की पहचान को दर्शाना, उपभोक्ताओं का भरोसा बढ़ाना और पारंपरिक कारीगरों की बाजार में स्थिति को मजबूत करना है।

लिडकॉम ने बयान में कहा कि चप्पल की हर जोड़ी के लिए QR-कोड वाला ऑथेंटिकेशन शुरू किया गया है। कोड स्कैन करके खरीदार, कारीगर या प्रोडक्शन यूनिट का नाम और स्थान, महाराष्ट्र में निर्माण के जिले, शिल्प तकनीक, इस्तेमाल हुए कच्चे माल, GI सर्टिफिकेशन की वैधता और स्टेटस जैसी जानकारी हासिल कर सकते हैं।

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