कौन हैं मिथलेश देसाई जिन्हें कहा जाता है जैकफ्रूट किंग? PM मोदी से मुलाकात का ये वीडियो वायरल

सोशल मीडिया पर इन दिनों महाराष्ट्र के ‘फणस किंग’ मिथिलेश देसाई की कहानी चर्चा में है। रत्नागिरी के इस किसान ने विदेश में इंजीनियर की नौकरी छोड़कर कटहल की खेती को अपना मिशन बनाया। हाल ही में दिल्ली में उनकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात हुई, जिसका वीडियो वायरल होने के बाद उनकी कहानी लोगों का ध्यान खींच रही है

अपडेटेड Aug 12, 2026 पर 9:15 AM
मिथिलेश की कहानी की खास बात यही है कि उनकी शुरुआत किसी बड़े कारोबारी निवेश से नहीं हुई थी।

सोशल मीडिया के दौर में किसी आम इंसान की खास कहानी कब देशभर में चर्चा का विषय बन जाए, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के एक छोटे से गांव के रहने वाले किसान मिथिलेश देसाई के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। कभी विदेश में इंजीनियर के तौर पर काम करने वाले मिथिलेश ने नौकरी की राह छोड़कर कटहल की खेती और रिसर्च को अपना मिशन बनाया। आज उन्हें ‘फणस किंग’ यानी ‘कटहल किंग’ के नाम से जाना जाता है। हाल ही में दिल्ली में एक शादी के रिसेप्शन के दौरान उनकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात हुई।

इस दौरान एनसीपी नेता शरद पवार ने उनका परिचय पीएम मोदी से कराया। मिथिलेश ने प्रधानमंत्री को अपने काम, कटहल की खेती और इससे जुड़े किसानों के बारे में जानकारी दी। दोनों की बातचीत का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद मिथिलेश एक बार फिर सुर्खियों में हैं।

एक रिसेप्शन में हुई मुलाकात और वायरल हो गई कहानी


सोमवार को सांसद सुप्रिया सुले की बेटी रेवती सुले और सारंग लखानी के रिसेप्शन का आयोजन दिल्ली में किया गया था। समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, राहुल गांधी और सोनिया गांधी समेत कई बड़े राजनीतिक चेहरे मौजूद थे। इसी दौरान शरद पवार ने रत्नागिरी के किसान मिथिलेश देसाई को प्रधानमंत्री से मिलवाया। मिथिलेश ने मोबाइल पर कुछ जानकारी दिखाते हुए पीएम मोदी को कटहल की खेती और अपने काम के बारे में बताया। वीडियो में प्रधानमंत्री बेहद ध्यान से उनकी बातें सुनते दिखाई दे रहे हैं। यही छोटा-सा संवाद सोशल मीडिया पर लोगों की दिलचस्पी का कारण बन गया।

आखिर कौन हैं ‘फणस किंग’ मिथिलेश देसाई?

मिथिलेश देसाई महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के लांजा तालुका स्थित झोपडे गांव के रहने वाले हैं। उनका बैकग्राउंड खेती से जुड़ा जरूर था, लेकिन उन्होंने उच्च शिक्षा के बाद एक अलग करियर की राह चुनी थी। उन्होंने राहुरी कृषि विद्यापीठ से एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग में बीटेक किया। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने UPSC की लिखित परीक्षा भी पास की, लेकिन इंटरव्यू में सफलता नहीं मिली। यह वह मोड़ था जहां मिथिलेश के सामने दो रास्ते थे नौकरी की तलाश जारी रखना या गांव लौटकर कुछ अलग करना। उन्होंने दूसरा रास्ता चुना।

पिता की खेती को बेटे ने बना दिया रिसर्च का विषय

मिथिलेश के पिता ने 2010 में अपने खेत में कटहल की खेती शुरू की थी। गर्मियों के मौसम में परिवार हाईवे किनारे कटहल बेचता था। मिथिलेश ने जब इस फल की संभावनाओं को करीब से देखा तो उन्हें महसूस हुआ कि कटहल सिर्फ गांवों में बिकने वाला सामान्य फल नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक बड़ा कृषि और कारोबारी अवसर भी छिपा है।

उन्होंने कटहल की विभिन्न किस्मों और इसकी खेती पर गंभीरता से काम शुरू किया। 2014 में उन्होंने 36 अलग-अलग प्रजातियों के कटहल के करीब 400 पेड़ लगाए। यह उनके प्रयोग का शुरुआती बड़ा कदम था।

केरल की एक वर्कशॉप ने बदल दी सोच

मिथिलेश के लिए साल 2017 काफी अहम साबित हुआ। केरल के वायनाड में कटहल को लेकर आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला में उन्होंने हिस्सा लिया। वहां उन्हें पता चला कि भारत के बाहर कई देशों में कटहल की मांग काफी ज्यादा है। वियतनाम, मलेशिया और थाईलैंड जैसे देशों में कटहल से जुड़े कारोबार ने उन्हें प्रभावित किया। उन्हें यह भी जानकारी मिली कि कटहल में मौजूद विभिन्न पोषक और औषधीय गुणों के कारण इसके फल के अलावा पेड़ के दूसरे हिस्सों की भी उपयोगिता हो सकती है। यहीं से मिथिलेश ने कटहल को सिर्फ खेती नहीं, बल्कि एक पूरी वैल्यू चेन के तौर पर देखना शुरू किया।

100 किसानों से शुरू हुआ सफर, अब 1077 सदस्य

कटहल की खेती और किसानों को बाजार से जोड़ने के उद्देश्य से मिथिलेश ने साल 2020 में एक किसान उत्पादक कंपनी शुरू की। जब इसकी शुरुआत हुई तो इसमें करीब 100 किसान जुड़े थे। धीरे-धीरे किसानों की संख्या बढ़ती गई और अब इसके 1077 सदस्य बताए जाते हैं। यह कंपनी मुख्य रूप से कटहल के साथ-साथ काजू और आम जैसे कृषि उत्पादों पर भी काम करती है। इस तरह मिथिलेश का व्यक्तिगत खेती का प्रयोग धीरे-धीरे कई किसानों के लिए सामूहिक कारोबार का मॉडल बन गया।

जब कटहल के पत्तों का भी मिला विदेशी बाजार

मिथिलेश की कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा सिर्फ कटहल की खेती नहीं, बल्कि उसके दूसरे हिस्सों का इस्तेमाल खोजने की कोशिश भी है। साल 2022 में उनकी कंपनी को जर्मनी से कटहल के पत्तों का ऑर्डर मिला। शुरुआत में करीब 1 टन पत्ते भेजे गए और अगले साल यह मात्रा बढ़कर 5 टन हो गई। मिथिलेश के मुताबिक, उन्हें जानकारी मिली कि इन पत्तों से अर्क तैयार किया जाता है और जर्मनी में इसे कैंसर मरीजों से जुड़े उपचार में इस्तेमाल किया जाता है। इस दावे के चिकित्सकीय पहलुओं की पुष्टि अलग से विशेषज्ञ स्रोतों से की जानी चाहिए, लेकिन किसानों के लिए यह उदाहरण जरूर दिखाता है कि कृषि उत्पादों के कम चर्चित हिस्सों में भी बाजार की संभावनाएं तलाश की जा सकती हैं।

नौकरी नहीं मिली तो खेती को ही बना लिया करियर

मिथिलेश की कहानी की खास बात यही है कि उनकी शुरुआत किसी बड़े कारोबारी निवेश से नहीं हुई थी। एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग की पढ़ाई, UPSC की कोशिश और फिर गांव लौटने के बाद उन्होंने परिवार की खेती से एक नई दिशा खोजी। उन्होंने जिस कटहल को कभी गांव के खेत और सड़क किनारे बिक्री के स्तर पर देखा था, उसी को रिसर्च, नई किस्मों, प्रोसेसिंग, निर्यात और किसानों के नेटवर्क से जोड़ने की कोशिश की।

आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हुई उनकी मुलाकात ने उनकी कहानी को सोशल मीडिया पर नई पहचान दे दी है। लेकिन मिथिलेश के लिए असली उपलब्धि शायद यह है कि एक फल की खेती को लेकर शुरू किया गया उनका प्रयोग अब 1000 से ज्यादा किसानों को अपने साथ जोड़ चुका है। ‘फणस किंग’ की कहानी यही बताती है कि खेती में बदलाव हमेशा बड़े शहरों या बड़ी कंपनियों से नहीं आता। कभी-कभी किसी छोटे से गांव का किसान भी किसी फसल में छिपी संभावना को पहचानकर उसके आसपास पूरा नया रास्ता तैयार कर सकता है।

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