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दिल्ली और हरियाणा की यमुना की मछलियों में बड़ा फर्क पता चला, किसमें ज्यादा माइक्रोप्लास्टिक? ये है चौंकाने वाली स्टडी का रिजल्ट

इस स्टडी के दौरान जितने भी मछलियों के सैंपल लिए गए, उनमें से एक भी मछली ऐसी नहीं मिली जो माइक्रोप्लास्टिक के पल्यूशन से पूरी तरह मुक्त हो। रिसर्चर्स ने यमुना नदी के दिल्ली वाले हिस्से को अत्यधिक माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया है।

Moneycontrol Hindi Newsअपडेटेड Aug 03, 2026 पर 6:18 PM
दिल्ली और हरियाणा की यमुना की मछलियों में बड़ा फर्क पता चला, किसमें ज्यादा माइक्रोप्लास्टिक? ये है चौंकाने वाली स्टडी का रिजल्ट
रिसर्चर्स ने इस स्टडी के लिए यमुना नदी के चार अलग-अलग जगहों हरियाणा के यमुनानगर व करनाल और दिल्ली के सूर घाट व सोनिया विहार से 12 अलग अलग प्रजातियों की कुल 220 ताजे पानी की मछलियों का एनालिसिस किया।

यमुना नदी के प्रदूषण को लेकर दिल्ली विश्वविद्यालय के रिसर्चर्स की एक नई स्टडी में बेहद चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। समाचार एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, हरियाणा से बहकर आने वाली यमुना नदी के मुकाबले दिल्ली के दायरे में तैरने वाली ताजे पानी की मछलियों के शरीर में माइक्रोप्लास्टिक (प्लास्टिक के बेहद सूक्ष्म कण) की मात्रा काफी अधिक पाई गई है। इस स्टडी के दौरान जितने भी मछलियों के सैंपल लिए गए, उनमें से एक भी मछली ऐसी नहीं मिली जो माइक्रोप्लास्टिक के पल्यूशन से पूरी तरह मुक्त हो। रिसर्चर्स ने यमुना नदी के दिल्ली वाले हिस्से को अत्यधिक माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया है।

दिल्ली की मछलियों में क्या मिला?

रिसर्चर्स ने इस स्टडी के लिए यमुना नदी के चार अलग-अलग जगहों हरियाणा के यमुनानगर व करनाल और दिल्ली के सूर घाट व सोनिया विहार से 12 अलग अलग प्रजातियों की कुल 220 ताजे पानी की मछलियों का एनालिसिस किया। इन मछलियों के शरीर से कुल 1678 माइक्रोप्लास्टिक कण बरामद किए गए। प्रति मछली औसतन लगभग 7.6 माइक्रोप्लास्टिक कण पाए जाने की पुष्टि हुई। सोनिया विहार और सूर घाट (दिल्ली) से पकड़ी गई मछलियों में हरियाणा के ऊपरी हिस्सों की तुलना में अधिक मात्रा में प्लास्टिक का जहर मिला है। दिल्ली के क्षेत्र में इस अत्यधिक प्रदूषण के पीछे अनट्रीटेड सीवेज का पानी, नगरपालिका का गंदा पानी, कपड़ा उद्योगों से निकलने वाला कचरा, बारिश के पानी का बहाव और नदी में सीधे फेंका जाने वाला अनप्रबंधित प्लास्टिक कचरा मुख्य वजह है।

मछलियों की प्रजातियों के आधार पर देखें तो सोनिया विहार से एकत्र की गई 20 तिलापिया मछलियों में सबसे अधिक 436 माइक्रोप्लास्टिक कण पाए गए, जो प्रति मछली औसतन 21.8 कण का रिकॉर्ड है। वहीं सूर घाट की तिलापिया मछलियों से 264 कण और सोनिया विहार की रोहू मछली से 205 कण मिले। इसके उलट सबसे कम प्रदूषण करनाल की 10 नीडल फिश में मिला। इनसे कुल 37 कण बरामद हुए। रिसर्च में यह भी पाया गया कि सबसे अधिक 751 माइक्रोप्लास्टिक कण मछलियों के पाचन तंत्र में मिले जबकि 605 कण उनके गलफड़ों और 322 कण मांसपेशियों के ऊतकों में पाए गए। मांसपेशियों में प्लास्टिक मिलना यह दर्शाता है कि ये खतरनाक कण पाचन तंत्र से निकलकर मछलियों के उन हिस्सों तक भी पहुंच रहे हैं, जिन्हें इंसान खाते हैं।

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