ISS का 30 साल का कार्यकाल इस दिन पूरा होगा, जानें कैसे होगा अंतरिक्ष के इस शानदार चैप्टर का अंत?

ISS मानव इतिहास का एक सुनहरा पन्ना है। यहां गुजरे तीन दशक अंतरिक्ष में इंसान की उड़ान के गवाह रहा ये सुनहरा अध्याय अब अपनी यात्रा पूरी करने के करीब है और जैसे किसी सेवा में 30 साल रहने के बाद इंसान रिटायर होता है, वैसे ही आईएसएस भी रिटायर होगा। जानिए ये कब होगा रिटायर

अपडेटेड Feb 06, 2026 पर 1:11 PM
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आईएसएस 2030 में अपना मिशन खत्म करने वाला है

अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS), मानव इतिहास के सबसे सुनहरे चैप्टर में से एक है। ये न सिर्फ इंसान की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक रहा है, बल्कि इसने दुनिया को दिखा है कि टकराव से अलग सहयोग का रास्ता मानवता को क्या कुछ दे सकता है। लेकिन कोई भी अध्याय चाहे कितना ही खूबसूरत क्यों न हो, उसका अंत होना तय है, वैसे इस चैप्टर के खत्म होने का भी समय करीब आ गया है। आईएसएस 2030 में अपना मिशन खत्म करने वाला है। स्पेस.कॉम की रिपोर्ट के मुताबिक इसे प्रशांत महासागर के ऊपर सुरक्षित रूप से नीचे लाया जाएगा।

कई हिस्से हो चुके हैं पुराने

आईएसएस के कई हिस्से समय के साथ पुराने हो चुके हैं। इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष एजेंसी (NASA) ने एलन मस्क की कंपनी SpaceX को आईएसएस को नीचे लाने के लिए एक खास वाहन बनाने की जिम्मेदारी सौंपी है। स्पेस स्टेशन की रफ्तार कम करके इसे प्रशांत महासागर के एक निर्जन इलाके में गिराया जाएगा। इस इलाके को 'पॉइंटनीमो' कहा जाता है। इसे पहले भी Mir स्पेस स्टेशन जैसे कई अंतरिक्ष यानों को गिराने के लिए इस्तेमाल किया गया है।

2 नवंबर 2000 को शुरू हुआ था ISS

आईएसएस 2 नवंबर, 2000 से लगातार इंसानों की मेजबानी कर रहा है। यह वो दिन था जब, एक अंतरिक्ष यात्री और दो रूसी कॉस्मोनॉट पहली बार आधे बने स्टेशन पर पहुंचे थे। इसे बनाने और चलाने में लगभग 150 बिलियन डॉलर का खर्च आया। नासा इसे बनाए रखने के लिए हर साल लगभग 3 बिलियन डॉलर खर्च करता है। यह स्टेशन फुटबॉल मैदान जितना बड़ा है और पृथ्वी के चारों ओर करीब 8 किलोमीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से चक्कर लगाता है।

25 साल में हुए 4000 से ज्यादा प्रयोग


नासा की रिपोर्ट के अनुसार, 25 सालों में स्टेशन पर 4,000 से ज्यादा एक्सपेरिमेंट किए गए हैं, जिनसे लगभग 4,400 रिसर्च पेपर बने हैं। हालांकि, ज्यादातर नतीजे क्रांतिकारी होने के बजाय धीरे-धीरे होने वाले थे। जब इसे 1990 के दशक में लॉन्च किया गया था, तो वैज्ञानिकों ने वादा किया था कि वहाँ किए गए प्रयोग कैंसर का इलाज खोजने या डार्क मैटर के रहस्यों को सुलझाने में मदद कर सकते हैं।

ग्लोबल सहयोग के मंच तौर पर सफल रहा सफर

एक्सेटर यूनिवर्सिटी की समाजशास्त्री पाओला कास्टानो-रोड्रिग्ज के अनुसार, इसकी सबसे बड़ी सफलता ग्लोबल सहयोग की भावना है। आईएसएस के मंच पर दुनिया भर के वैज्ञानिकों और देशों ने साथ मिल कर कई एक्सपेरिमेंट्स को अंजाम दिया। आईएसएस ने अंतरिक्ष को न सिर्फ एक रिसर्च हब बल्कि इंसानी सहयोग की एक जीवित प्रयोगशाला बनाया है। कास्टानो-रोड्रिग्ज ISS पर वैज्ञानिक रिसर्च और ग्लोबल सहयोग के असर का अध्ययन करती हैं। वह 'बियॉन्ड द लैब- द सोशल लाइव्स ऑफ एक्सपेरिमेंट्स ऑन द इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन' नाम की एक किताब लिख रही हैं।

अंतरिक्ष में रहेगा सिर्फ चीन का स्पेस स्टेशन

ऐसा नहीं होगा कि आईएसएस के खत्म होने के बाद अंतरिक्ष सूना हो जाएगा। यहां लो अर्थ ऑर्बिट में चीन का तियांगोंग स्पेस स्टेशन रहेगा। अब जेफ बेजोस की Blue Origin और Axiom Space जैसी कंपनियां व्यावसायिक स्पेस स्टेशन बनाने की योजना पर काम कर रही हैं। भारत भी अपना स्पेस स्टेशन लॉन्च करने की योजना बना रहा है।

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