पाकिस्तान पर भारी भारत का जबरदस्त 'डोज', अफगान बजारों से आउट हुईं PAK की दवाइयां
पाकिस्तान से दवाओं की सप्लाई रुकने के बाद अफगानिस्तान में भारतीय दवाओं की मांग तेज़ी से बढ़ी है। इसका फायदा भारत के फार्मास्यूटिकल एक्सपोर्ट को मिला है। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने अफगानिस्तान को करीब 108 मिलियन डॉलर की दवाएं भेजीं। अनुमान है कि 2025 के बाकी महीनों में भी लगभग 100 मिलियन डॉलर की दवाएं और एक्सपोर्ट की जाएंगी
अफगानिस्तान में एक मोहल्ले की फार्मेसी से की गई एक छोटी-सी दवा खरीदारी आज एक बड़े क्षेत्रीय बदलाव की तस्वीर दिखा रही है।
अफगानिस्तान में एक मोहल्ले की फार्मेसी से की गई एक छोटी-सी दवा खरीदारी आज एक बड़े क्षेत्रीय बदलाव की तस्वीर दिखा रही है। राजनीतिक तनाव और दवाओं की गुणवत्ता को लेकर बढ़ती चिंताओं के कारण पाकिस्तान का फार्मा एक्सपोर्ट लगातार घट रहा है। इसी बीच भारतीय दवाएं बिना ज़्यादा शोर किए इस कमी को पूरा कर रही हैं।यह कहानी पहले एक अफगान ब्लॉगर की सोशल मीडिया पोस्ट के रूप में सामने आई थी, लेकिन अब यह साफ संकेत दे रही है कि अफगानिस्तान की हेल्थकेयर सप्लाई चेन में बड़ा बदलाव हो चुका है। पाकिस्तान धीरे-धीरे इस सिस्टम से बाहर होता जा रहा है, जबकि भारत एक भरोसेमंद विकल्प के तौर पर उभर रहा है।
यह बदलाव ऐसे समय में हो रहा है जब अफगानिस्तान बुनियादी दवाओं के लिए काफी हद तक इंपोर्ट पर निर्भर है। कभी इस बाजार पर पाकिस्तान का मजबूत नियंत्रण था, लेकिन सीमा बंद होने, बार-बार होने वाले टकराव और तालिबान द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों ने सप्लाई को बुरी तरह प्रभावित किया। इसके उलट भारत ने सस्ती और भरोसेमंद दवाओं के साथ-साथ आपातकालीन मदद भी दी है। इसी वजह से भारत धीरे-धीरे अफगान बाजार में अपनी स्थिति मजबूत करता जा रहा है।
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सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अफगानिस्तान के ब्लॉगर फजल अफगान ने हाल ही में एक स्थानीय फार्मेसी से जुड़ा अपना अनुभव शेयर किया, जो देखते ही देखते चर्चा में आ गया। उन्होंने बताया कि सिरदर्द के लिए वे दवा खरीदने गए थे और उन्होंने पहले पैरोल मांगी, जो पाकिस्तान और तुर्की में बिकने वाली पैरासिटामोल की एक जानी-पहचानी ब्रांड है। उन्हें इस दवा की क्वालिटी पर भरोसा था।
फजल ने लिखा कि 10 गोलियों का एक पैकेट 40 अफगानी में मिल रहा था। इसके बाद दुकानदार ने उन्हें एक दूसरा विकल्प दिखाया—भारत में बनी पैरासिटामोल। गोलियों की संख्या वही थी, लेकिन कीमत सिर्फ 10 अफगानी थी। दुकानदार ने यह भी बताया कि भारतीय दवाएं बाकी दवाओं के मुकाबले ज़्यादा असरदार साबित हो रही हैं। फजल ने बिना देर किए भारतीय दवा खरीद ली। उन्होंने बताया कि इससे उनका सिरदर्द जल्दी ठीक हो गया। अपने अनुभव के आधार पर उन्होंने लिखा कि अफगानिस्तान में अब धीरे-धीरे भारतीय दवाएं पाकिस्तानी दवाओं की जगह लेती जा रही हैं।
पाकिस्तान अफगानिस्तान के फार्मा बाजार से बाहर
कई दशकों तक पाकिस्तान अफगानिस्तान में दवाओं का सबसे बड़ा सप्लायर रहा। इसकी वजह दोनों देशों की नज़दीकी और तोरखम व चमन जैसे जमीनी रास्ते थे, जिनसे दवाएं आसानी से पहुंच जाती थीं। अफगानिस्तान में बहुत कम दवाएं स्थानीय स्तर पर बनती हैं, इसलिए देश अपनी कुल फार्मा ज़रूरतों का करीब 85 से 96 प्रतिशत हिस्सा बाहर से आयात करता है।
Trading Economics के हवाले से दिए गए UN Comtrade के आंकड़ों के अनुसार, साल 2024 में पाकिस्तान ने अफगानिस्तान को करीब 186.69 मिलियन डॉलर की दवाएं निर्यात की थीं। वहीं, Business Recorder की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 में अफगानिस्तान को पाकिस्तान का फार्मा एक्सपोर्ट 112.8 मिलियन डॉलर का था। इसके अलावा, तालिबान के अधिकारी नरल्लाह नूरी ने पहले कहा था कि नवंबर 2025 से पहले अफगानिस्तान में इस्तेमाल होने वाली 70 प्रतिशत से ज़्यादा दवाएं पाकिस्तान से आती थीं। हालांकि अब हालात बदल चुके हैं। सीमा संबंधी दिक्कतों और सप्लाई में रुकावटों के चलते पाकिस्तान धीरे-धीरे अफगानिस्तान के फार्मा बाजार से बाहर होता जा रहा है।
बार-बार सीमा पर झड़पें होने और रास्ते बंद रहने से पाकिस्तान का यह दबदबा धीरे-धीरे खत्म हो गया। अक्टूबर और नवंबर 2025 में नए तनाव के बाद अफगानिस्तान के उप-प्रधानमंत्री अब्दुल गनी ने दवाओं की खराब क्वालिटी का हवाला देते हुए पाकिस्तानी दवाओं पर रोक लगा दी। इसके साथ ही व्यापारियों से कहा गया कि वे भारत, ईरान और सेंट्रल एशिया जैसे दूसरे देशों से दवाओं के विकल्प तलाशें। इस फैसले के बाद अफगानिस्तान में दवाओं की कमी पैदा हो गई। Deutsche Welle की एक रिपोर्ट के मुताबिक, एंटीबायोटिक, इंसुलिन और दिल की दवाएं मिलना मुश्किल हो गईं। दवाओं की कीमतें बढ़ गईं और बाजार में नकली दवाओं की संख्या भी बढ़ने लगी। पाकिस्तान से सप्लाई अचानक बंद होने का सबसे ज़्यादा असर आम अफगान मरीजों पर पड़ा, जिन्हें समय पर और सही इलाज मिलना और भी कठिन हो गया।
भारतीय फार्मा कंपनियों ने अफगान बाजार में खाली जगह भरी
पाकिस्तान से दवाओं की सप्लाई रुकने के बाद अफगानिस्तान में भारतीय दवाओं की मांग तेज़ी से बढ़ी है। इसका फायदा भारत के फार्मास्यूटिकल एक्सपोर्ट को मिला है। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने अफगानिस्तान को करीब 108 मिलियन डॉलर की दवाएं भेजीं। अनुमान है कि 2025 के बाकी महीनों में भी लगभग 100 मिलियन डॉलर की दवाएं और एक्सपोर्ट की जाएंगी।
अफगान अखबार हश्त-ए सुब्ह के मुताबिक, अब अफगानिस्तान के फार्मा बाजार में भारत की हिस्सेदारी 12 से 15 प्रतिशत तक पहुंच गई है। पहले यहां पाकिस्तान का दबदबा था और उसकी हिस्सेदारी 35 से 40 प्रतिशत के बीच थी। लेकिन पाकिस्तानी कंपनियों की बिक्री घटने से भारत के सामने बड़ा मौका खुल गया है। माना जा रहा है कि भारत आने वाले समय में अपना एक्सपोर्ट बढ़ाकर 200 मिलियन डॉलर तक कर सकता है।
नवंबर 2025 में भारत की दवा कंपनी Zydus Lifesciences ने दुबई में अफगानिस्तान के Rofeeds International Group के साथ 100 मिलियन डॉलर का एक समझौता (MoU) किया। इस समझौते में दवाओं का एक्सपोर्ट, तकनीक साझा करना, अफगानिस्तान में ज़ाइडस का प्रतिनिधि कार्यालय खोलना और आगे चलकर स्थानीय स्तर पर दवाओं का उत्पादन शुरू करना शामिल है, ताकि इंपोर्ट पर निर्भरता कम हो सके।
इसके अलावा, अफगानिस्तान के Taliban के अधिकारी भी भारत की फार्मा एक्सपोर्ट संस्था Pharmexcil के साथ संयुक्त निवेश और उत्पादन इकाइयों को लेकर बातचीत कर रहे हैं। इससे साफ है कि आने वाले समय में भारत और अफगानिस्तान के बीच फार्मा सेक्टर में सहयोग और मज़बूत हो सकता है।